‘जान दे देंगे, जमीन नहीं देंगे’ के पोस्टर: क्या है किसानों की बेबसी?

काशी द्वार परियोजना विरोध के तहत वाराणसी के चनौली गांव समेत 11 गांवों में किसान जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं। बाबतपुर एयरपोर्ट के पास प्रस्तावित 900 एकड़ टाउनशिप परियोजना को लेकर मुआवजे और विस्थापन पर विवाद गहराया।

हाइलाइट्स :

  • वाराणसी के चनौली गांव में जमीन अधिग्रहण का विरोध
  • “जान दे देंगे, जमीन नहीं देंगे” पोस्टर चर्चा में
  • 11 गांवों की 900 एकड़ जमीन अधिग्रहण प्रस्तावित
  • किसान बोले – मुआवजा कम, विस्थापन अस्वीकार्य
  • प्रशासन का दावा – सर्किल रेट से चार गुना मुआवजा

वाराणसी । वाराणसी से करीब 50 किलोमीटर दूर चनौली गांव इन दिनों सुर्खियों में है। गांव के लगभग हर घर, खेत और सड़क किनारे एक ही नारा लिखा दिखता है— “जान दे देंगे, मगर जमीन नहीं देंगे।” यह विरोध चनौली गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के 11 गांवों में भी इसी तरह का माहौल है।

मामला बहुचर्चित काशी द्वार परियोजना (Kashi Dwar Project) से जुड़ा है, जिसके तहत बाबतपुर एयरपोर्ट के पास करीब 900 एकड़ भूमि पर एक नई टाउनशिप और स्पोर्ट्स सिटी बसाने की योजना है। प्रशासन इसे विकास की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, वहीं किसान इसे अपने अस्तित्व पर संकट मान रहे हैं।

तीन साल से जारी है विरोध

गांव की लगभग 2000 आबादी पिछले तीन वर्षों से भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रही है। किसानों का कहना है कि उनकी जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों की विरासत है।

गांव की महिलाओं ने घरों पर पोस्टर चिपकाए हैं। उनका कहना है,

“यह जमीन हमारी मां है। हम अपनी मां का सौदा नहीं करेंगे।”

कई ग्रामीणों का आरोप है कि विरोध करने पर पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी और दबाव का सामना करना पड़ता है।

‘मुआवजा नहीं, सम्मान चाहिए’

किसानों का कहना है कि सरकार द्वारा दिया जा रहा मुआवजा वास्तविक बाजार मूल्य से काफी कम है। उनके अनुसार, जहां जमीन की मौजूदा कीमत 30–40 लाख रुपये प्रति बीघा तक है, वहीं मुआवजा 3 से 10 लाख रुपये के बीच प्रस्तावित किया जा रहा है।

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि इतनी राशि में न तो वैसी जमीन मिल सकती है और न ही नया घर बसाया जा सकता है। उनका डर केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है—

“गांव छोड़ेंगे तो समाज टूट जाएगा, रिश्ते बिखर जाएंगे।”

प्रशासन का पक्ष

परियोजना से जुड़े अधिकारी प्रशांत वर्धन का कहना है कि यह एक नियोजित शहरी विकास योजना है, जिसमें अस्पताल, स्कूल, पार्क और अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी। उनका दावा है कि:

  • किसी से जबरन जमीन नहीं ली जा रही।
  • सर्किल रेट से चार गुना तक मुआवजा दिया जा रहा है।
  • अब तक 80 किसानों ने रजिस्ट्री कराई है और लगभग 90 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है।
  • पक्के मकानों और आबादी वाले हिस्सों को समायोजित किया गया है।

प्रशासन का कहना है कि कुछ लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं, जबकि किसानों का आरोप है कि जमीनी हकीकत अलग है।

विकास बनाम विस्थापन

यह विवाद केवल जमीन का नहीं, बल्कि विकास की परिभाषा का भी है।

  • सरकार इसे क्षेत्र के शहरी विस्तार और रोजगार सृजन का अवसर मान रही है।
  • किसान इसे अपनी जड़ों से उखाड़े जाने की प्रक्रिया के रूप में देख रहे हैं।

कई ग्रामीणों की मांग है कि यदि विकास करना है तो गांव को ही मॉडल गांव के रूप में विकसित किया जाए, ताकि उन्हें विस्थापित न होना पड़े।

भावनात्मक और सामाजिक संकट

गांव की बुजुर्ग महिलाओं की आंखों में आंसू हैं। उनका कहना है कि चार पीढ़ियों से बसे घर-आंगन छोड़ना आसान नहीं। यहां हर दुख-सुख में साथ देने वाला समाज है। नए स्थान पर यह सामुदायिक सहारा मिलेगा या नहीं, यह बड़ी चिंता है।

काशी द्वार परियोजना को लेकर बनारस के ग्रामीण इलाकों में गहराता विरोध विकास और विस्थापन के बीच संतुलन की चुनौती को उजागर करता है। एक ओर आधुनिक टाउनशिप का सपना है, तो दूसरी ओर खेत-खलिहानों से जुड़ी पीढ़ियों की स्मृतियां और आजीविका।

अब देखना यह है कि प्रशासन और किसानों के बीच संवाद का कोई रास्ता निकलता है या यह संघर्ष और लंबा खिंचता है।

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