Caste Census Supreme Court CJI Remark: “सुप्रीम कोर्ट ने जाति जनगणना रोकने की याचिका खारिज की। सीजेआई सूर्यकांत ने अभद्र भाषा पर फटकार लगाई। जानें पूरा मामला और कोर्ट की टिप्पणी। “
प्रमुख बिंदु :
• Supreme Court of India ने जाति जनगणना रोकने की याचिका खारिज की
• CJI Justice Surya Kant ने याचिकाकर्ता को लगाई कड़ी फटकार
• याचिका में इस्तेमाल भाषा को बताया अभद्र और अस्वीकार्य
• केंद्र सरकार को नीतिगत निर्देश देने की मांग भी ठुकराई
• पहले भी इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट दिखा चुका है सख्त रुख
नई दिल्ली। Supreme Court of India ने जाति जनगणना पर रोक लगाने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant ने याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी नाराजगी जताते हुए याचिकाकर्ता को फटकार लगाई।
सीजेआई Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली शामिल थे, ने कहा कि याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा अस्वीकार्य और अभद्र है। अदालत ने याचिकाकर्ता से तीखे सवाल करते हुए पूछा, “आप ऐसी बदतमीजी की भाषा कहां से सीखते हैं? इस तरह की याचिका कैसे दाखिल की जाती है?”
दरअसल, याचिका में केंद्र सरकार को जाति जनगणना रोकने, संसाधनों के पुनर्वितरण को जनसंख्या उत्तरदायित्व से जोड़ने और एक बच्चे वाले परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देने जैसी नीतियां बनाने के निर्देश देने की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत ने न केवल इन मांगों को खारिज किया, बल्कि याचिका की भाषा को भी न्यायिक मर्यादा के विपरीत बताया।
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों की भाषा गरिमापूर्ण और जिम्मेदार होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की अभद्र भाषा न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
गौरतलब है कि जाति जनगणना के मुद्दे पर इससे पहले भी शीर्ष अदालत सख्त रुख दिखा चुकी है। 2 फरवरी को भी Supreme Court of India ने 2027 की जनगणना में जातिगत आंकड़े शामिल करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली एक अन्य याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, 2027 में प्रस्तावित 16वीं राष्ट्रीय जनगणना देश की पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें 1931 के बाद पहली बार व्यापक स्तर पर जातिगत आंकड़े शामिल किए जाने की संभावना है। ऐसे में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से बेहद संवेदनशील बना हुआ है।
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