क्या राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को बुलाने के लिए बाध्य हैं? जानिए SC का ऐतिहासिक फैसला

एस.आर. बोम्मई और रामेश्वर प्रसाद केस का हवाला देकर फिर चर्चा में आया ‘फ्लोर टेस्ट’ सिद्धांत

तमिलनाडु में थलापति विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं मिलने पर बहस तेज है। जानिए बिहार विधानसभा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की भूमिका, फ्लोर टेस्ट और सबसे बड़ी पार्टी को बुलाने को लेकर क्या ऐतिहासिक फैसला दिया था।

नई दिल्ली। थलापति विजय की पार्टी को सरकार गठन का न्योता नहीं दिए जाने को लेकर संवैधानिक बहस तेज हो गई है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों, खासकर 1994 के एस.आर. बोम्मई मामला और 2006 के रामेश्वर प्रसाद मामला का फिर से जिक्र होने लगा है।

सुप्रीम Court ने इन मामलों में स्पष्ट कहा था कि चुनाव के बाद सरकार बनाने का पहला अवसर सबसे बड़ी पार्टी या बहुमत का दावा करने वाले गठबंधन को दिया जाना चाहिए और राज्यपाल इस बात की जांच नहीं कर सकते कि समर्थन कैसे जुटाया गया।

बिहार विधानसभा भंग मामले में हुई थी तीखी टिप्पणी

2005 में बिहार विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। उस समय तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने रिपोर्ट भेजकर आशंका जताई थी कि सरकार गठन के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त हो सकती है। इसके बाद केंद्र सरकार ने विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था।

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 2006 में संविधान पीठ ने अपने फैसले में तत्कालीन यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि “हॉर्स ट्रेडिंग” की आशंका के आधार पर किसी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।

‘बहुमत का फैसला सदन में होगा’

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बहुमत का परीक्षण केवल विधानसभा के पटल पर ही होना चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि यदि चुनाव के बाद दो या अधिक दल मिलकर बहुमत का दावा करते हैं, तो राज्यपाल का काम केवल उन्हें अवसर देना है, न कि उनके राजनीतिक समझौते की नैतिकता पर फैसला सुनाना।

अदालत ने यह भी कहा था कि यदि राज्यपाल “मनगढ़ंत आशंकाओं” के आधार पर सरकार गठन रोकने लगें, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करेगा।

एस.आर. बोम्मई फैसले का भी दिया गया था हवाला

1994 के ऐतिहासिक एस.आर. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने और निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त करने की सीमाएं तय की थीं। अदालत ने कहा था कि चुनी हुई सरकार का बहुमत सदन में परखा जाना चाहिए, न कि राजभवन में।

कोर्ट ने राज्यपालों की शक्तियों के दुरुपयोग के प्रति भी आगाह किया था और कहा था कि इस तरह के फैसले लोकतांत्रिक जनादेश को प्रभावित कर सकते हैं।

तमिलनाडु की राजनीति में बढ़ी संवैधानिक बहस

अब जब तमिलगा वेत्री कझगम प्रमुख थलापति विजय को सरकार गठन के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं, तब विपक्ष और संवैधानिक विशेषज्ञ इन पुराने फैसलों का हवाला दे रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई दल या गठबंधन बहुमत का दावा पेश करता है, तो संवैधानिक परंपरा के अनुसार राज्यपाल को उसे सदन में बहुमत साबित करने का अवसर देना चाहिए।

इस पूरे विवाद के बीच एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला राजभवन नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए।

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