छत्तीसगढ़ की शान तीजन बाई का निधन, पंडवानी गायन की सबसे बड़ी पहचान का हुआ अंत

पद्म विभूषण और पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का रायपुर एम्स में 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली महान कलाकार के जीवन, उपलब्धियों और योगदान पर पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।

रायपुर। भारतीय लोककला की सबसे सशक्त और विशिष्ट आवाज़ हमेशा के लिए मौन हो गई। छत्तीसगढ़ की लोकगायिका, पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी की अप्रतिम साधिका डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं और पिछले कई सप्ताह से उम्र संबंधी गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। एम्स के चिकित्सकों के अनुसार उन्होंने सुबह करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही भारतीय लोक-संगीत और रंगमंच के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन हो गया।

देशभर में शोक, सांस्कृतिक जगत ने खोया अनमोल रत्न

तीजन बाई के निधन की सूचना मिलते ही छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। कलाकारों, साहित्यकारों, लोकगायकों और जनप्रतिनिधियों ने इसे भारतीय लोक संस्कृति की अपूरणीय क्षति बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अनेक नेताओं और सांस्कृतिक हस्तियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उन्हें भारतीय लोक परंपरा की अमर धरोहर बताया।

13 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ था अद्भुत सफर

दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने महज 13 वर्ष की आयु में पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया था। उस समय पंडवानी गायन में महिलाओं के लिए केवल बैठकर प्रस्तुति देने की परंपरा थी, जिसे ‘वेदमती शैली’ कहा जाता था। लेकिन तीजन बाई ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए खड़े होकर अभिनय और संवाद के साथ ‘कापालिक शैली’ में प्रस्तुति देने का साहस किया। हाथ में तंबूरा और बुलंद आवाज़ के साथ महाभारत के पात्रों को मंच पर जीवंत करने की उनकी शैली ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

महाभारत को बना दिया जीवंत रंगमंच

तीजन बाई केवल गायिका नहीं थीं, बल्कि मंच पर अकेले ही महाभारत के अनेक पात्रों का अभिनय कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। उनके तंबूरे की थाप, मुखर अभिव्यक्ति, संवाद और अभिनय ने पंडवानी को केवल लोकगायन नहीं, बल्कि जीवंत रंगमंच का स्वरूप प्रदान किया। भीम, अर्जुन, द्रौपदी, कर्ण और श्रीकृष्ण जैसे पात्र उनकी आवाज़ में सजीव हो उठते थे।

गांव से निकलकर दुनिया के मंचों तक पहुंची लोककला

तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की लोककला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने भारत ही नहीं, बल्कि जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, रूस और कई अन्य देशों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित अनेक राष्ट्राध्यक्षों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय लोकसंस्कृति का गौरव बढ़ाया। उनकी प्रस्तुतियों ने दुनिया को यह बताया कि भारत की लोक परंपराएं कितनी समृद्ध और जीवंत हैं।

सम्मानों से सजा रहा गौरवशाली सफर

भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि सम्मान तथा जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका कला एवं संस्कृति पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।

महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

तीजन बाई ने केवल पंडवानी को नई पहचान नहीं दी, बल्कि महिलाओं के लिए भी एक नई राह बनाई। जिस दौर में लोककलाओं में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी, उस समय उन्होंने मंच पर खड़े होकर अपनी दमदार प्रस्तुति से यह साबित किया कि प्रतिभा किसी परंपरा या बंधन की मोहताज नहीं होती। उनके संघर्ष और सफलता ने हजारों महिला कलाकारों को आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।

लोककला का कभी न भरने वाला रिक्त स्थान

तीजन बाई का निधन केवल एक महान कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक ऐसे युग का अंत है जिसने महाभारत की अमर कथा को गांव-गांव से निकालकर विश्व मंच तक पहुंचाया। उनकी आवाज़ भले ही अब मौन हो गई हो, लेकिन तंबूरे की वह थाप और पंडवानी की वह गूंज भारतीय संस्कृति के इतिहास में सदैव जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियां उन्हें लोककला की उस अमर साधिका के रूप में याद करेंगी, जिसने अपनी कला से भारतीय संस्कृति को विश्वभर में सम्मान दिलाया।

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