‘अंधाधुन’ से ‘इक्कीस’ तक श्रीराम राघवन का सफर, बोले- अवॉर्ड के लिए नहीं, दर्शकों के लिए बनाता हूं फिल्म

निर्देशक श्रीराम राघवन ने जम्मू-कश्मीर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्मी यात्रा, क्राइम थ्रिलर से लगाव, FTII की शुरुआती फिल्मों और ‘इक्कीस’ पर बात की। उन्होंने कहा कि फिल्में अवॉर्ड के लिए नहीं, दर्शकों के लिए बनाते हैं।

श्रीनगर। फिल्म निर्देशक श्रीराम राघवन ने अपनी फिल्मों की पहचान बनाने वाले क्राइम, सस्पेंस और थ्रिलर जॉनर को लेकर अपने अनुभव साझा किए। जम्मू-कश्मीर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से इतर बातचीत में उन्होंने अपनी शुरुआती फिल्मी रुचि, फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) के दिनों, शुरुआती प्रोजेक्ट्स, पुरस्कारों को लेकर अपनी सोच और आगामी युद्ध आधारित फिल्म ‘इक्कीस’ के बारे में विस्तार से बात की।

‘एक हसीना थी’, ‘जॉनी गद्दार’, ‘बदलापुर’, ‘अंधाधुन’ और ‘मेरी क्रिसमस’ जैसी फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले श्रीराम राघवन ने सस्पेंस, अपराध और जटिल किरदारों वाली कहानियों के जरिए अलग पहचान बनाई है। उनकी फिल्म ‘अंधाधुन’ को हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।

बचपन से क्राइम नॉवेल और थ्रिलर में दिलचस्पी

श्रीराम राघवन ने बताया कि फिल्मों में आने से पहले ही उनकी रुचि क्राइम फिक्शन और क्लासिक थ्रिलर में थी। उन्होंने कहा कि स्कूल और कॉलेज के दिनों में वह क्राइम नॉवेल पढ़ने में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे।

उन्होंने विजय आनंद और बीआर चोपड़ा जैसे फिल्मकारों का भी उल्लेख किया, जिनकी थ्रिलर फिल्मों ने उन्हें प्रभावित किया। राघवन के मुताबिक, यह रुचि किसी योजना के तहत विकसित नहीं हुई, बल्कि धीरे-धीरे क्राइम और सस्पेंस वाली कहानियां उन्हें आकर्षित करने लगीं।

‘ज्वेल थीफ’ को बार-बार देखना पसंद

विजय आनंद की फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ का जिक्र करते हुए राघवन ने कहा कि वह फिल्म को कई बार देख सकते हैं। उनके मुताबिक, फिल्म की कहानी, सस्पेंस और उसके खुलासे के बारे में पहले से पता होने के बावजूद उसकी शैली और प्रस्तुति उन्हें आकर्षित करती है।

उन्होंने बताया कि फिल्म देखने का आनंद सिर्फ कहानी में आगे क्या होगा, यह जानने तक सीमित नहीं है। निर्देशन की शैली, कैमरा, प्रस्तुति और फिल्म की पूरी भाषा भी दर्शक को बार-बार फिल्म देखने के लिए प्रेरित कर सकती है।

FTII में मिली अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की समझ

फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिले के बाद राघवन की सिनेमाई समझ का दायरा और विस्तृत हुआ। उन्होंने बताया कि FTII में उन्हें फ्रांस, इटली और अन्य देशों की कई थ्रिलर फिल्में देखने का अवसर मिला।

उन्होंने मशहूर निर्देशक अल्फ्रेड हिचकॉक का उल्लेख करते हुए खुद को उनका विद्यार्थी बताया। अंतरराष्ट्रीय थ्रिलर सिनेमा से परिचय ने उनके फिल्म निर्माण के नजरिए को और मजबूत किया।

‘एट कॉलम्स’ ने दिलाया राष्ट्रीय पुरस्कार

FTII में पढ़ाई के दौरान राघवन ने ‘एट कॉलम्स’ (Eight Columns) नाम की डिप्लोमा फिल्म बनाई थी, जिसे बाद में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने बताया कि संस्थान में विद्यार्थी छोटे-छोटे क्रू के साथ कई प्रोजेक्ट तैयार करते थे और कोर्स के दौरान डिप्लोमा फिल्म बनाते थे।

‘एट कॉलम्स’ का विचार भी काफी अलग था। इसकी कहानी एक अखबार के इर्द-गिर्द थी, जिसमें एक लड़का अखबार के पहले पन्ने पर और एक लड़की आखिरी पन्ने पर दिखाई देती थी।

राघवन ने बताया कि इसका मूल विचार यह था कि जब दोनों किरदार जीवित हैं तो अखबार भी जीवित है। हालांकि, इस विचार को स्क्रीन पर उतारना आसान नहीं था, खासकर छात्र फिल्म के स्तर पर।

साथियों की मदद से पूरा हुआ मुश्किल प्रोजेक्ट

राघवन ने बताया कि उनकी फिल्म को पूरा करने में FTII के दूसरे विद्यार्थियों ने काफी मदद की। सीमित संसाधनों और चुनौतीपूर्ण अवधारणा के बावजूद टीम ने फिल्म पूरी की और उसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

उन्होंने यह भी बताया कि फिल्मकार सईद मिर्जा इस फिल्म के बाहरी परीक्षक थे और उन्होंने फिल्म को सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी।

FTII के बाद राघवन ने टेलीविजन में भी काम किया। उन्होंने ‘आहट’ और ‘सीआईडी’ जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों से जुड़कर अनुभव हासिल किया और बाद में फीचर फिल्मों की दुनिया में कदम रखा।

‘अवॉर्ड के लिए कोई फिल्म नहीं बनाता’

पुरस्कारों को लेकर अपनी सोच स्पष्ट करते हुए श्रीराम राघवन ने कहा कि कोई भी फिल्मकार राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए फिल्म नहीं बनाता। उनके मुताबिक, उनका मुख्य उद्देश्य दर्शकों के लिए अच्छी फिल्म बनाना है।

उन्होंने कहा कि वह किसी फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार हासिल करने की इच्छा से फिल्म नहीं बनाते। उनकी प्राथमिकता ऐसी फिल्म बनाने की है जिसे दर्शक पसंद करें और जिसमें वह अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकें।

राघवन की फिल्मों में ‘जॉनी गद्दार’ को जहां मजबूत कल्ट फॉलोइंग मिली, वहीं ‘अंधाधुन’ ने आलोचकों के साथ-साथ दर्शकों के बीच भी बड़ी सफलता हासिल की।

‘इक्कीस’ मेरे कम्फर्ट जोन से बाहर की फिल्म

जम्मू-कश्मीर फिल्म फेस्टिवल में राघवन ने अपनी आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ को लेकर भी चर्चा की। यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ी एक सच्ची कहानी पर आधारित युद्ध ड्रामा है।

राघवन ने स्वीकार किया कि यह फिल्म उस तरह की नहीं थी, जिसके लिए वह आमतौर पर पहचाने जाते हैं। उन्होंने इसे अपने कम्फर्ट जोन से बाहर की फिल्म बताया।

उनके मुताबिक, कहानी से प्रभावित होने के बाद उन्होंने इसे पर्दे पर लाने का फैसला किया। हालांकि, फिल्म के बड़े स्तर और युद्ध के दृश्यों को वास्तविक रूप देना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी।

1971 के युद्ध का माहौल दिखाना बड़ी चुनौती

राघवन ने बताया कि फिल्म में उस दौर के सैन्य उपकरणों को दोबारा दिखाना आसान नहीं था। 1971 के समय इस्तेमाल होने वाले कई टैंक अब उपलब्ध नहीं हैं और जो बचे हैं, उनमें से कई संग्रहालयों में रखे गए हैं।

ऐसे में फिल्म की टीम को ऐसे उपकरण डिजाइन करने पड़े, जो स्क्रीन पर वास्तविक नजर आएं। इसके लिए विजुअल इफेक्ट्स का सहारा लिया गया।

हालांकि, राघवन का कहना है कि उनकी कोशिश थी कि दर्शकों को यह महसूस न हो कि फिल्म में वीएफएक्स का इस्तेमाल किया गया है। उनका उद्देश्य तकनीक को कहानी के पीछे रखना और दृश्य को वास्तविक बनाए रखना था।

कश्मीर के युवा फिल्मकारों से अपनी कहानी कहने की अपील

श्रीनगर की अपनी पहली यात्रा को याद करते हुए राघवन ने कहा कि फिल्म फेस्टिवल में युवाओं और विद्यार्थियों से बातचीत उनके लिए खास अनुभव रही। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में युवा फिल्मकारों के बीच काफी उत्साह है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि ऐसे फिल्म समारोह क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाली फिल्म निर्माण संस्कृति विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

राघवन ने जम्मू-कश्मीर के उभरते फिल्मकारों से अपनी कहानियों को सामने लाने की अपील की। उन्होंने कहा कि युवा फिल्मकारों को अपनी जिंदगी और अपने अनुभवों से जुड़ी कहानियां लिखनी चाहिए और उन्हें दुनिया तक पहुंचाना चाहिए।

थ्रिलर से युद्ध ड्रामा तक नया प्रयोग

श्रीराम राघवन की अब तक की फिल्मों को देखें तो अपराध, सस्पेंस और थ्रिलर उनकी पहचान रहे हैं। ऐसे में ‘इक्कीस’ के जरिए युद्ध ड्रामा की ओर उनका कदम एक अलग तरह का सिनेमाई प्रयोग है।

राघवन के मुताबिक, जॉनर बदलने के बावजूद कहानी उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। ‘इक्कीस’ की चुनौतीपूर्ण शूटिंग और बड़े स्तर की प्रस्तुति के बीच उन्होंने इसे मुश्किल लेकिन आनंददायक अनुभव बताया। उनका कहना है कि अच्छी कहानी ही किसी कठिन फिल्म को बनाने की प्रक्रिया को रोचक बनाए रखती है।

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