
“वंदे मातरम् न गाना क्या दंडनीय अपराध है? सुप्रीम कोर्ट ने टीएम कृष्णा की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। जानें पूरा मामला और कोर्ट की टिप्पणी।“
नई दिल्ली। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् न गाना क्या दंडनीय अपराध है, यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कर्नाटक संगीत गायक टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में वंदे मातरम् के सभी छह छंदों को गाने की अनिवार्यता और इससे जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर वंदे मातरम् के राष्ट्रीय गीत होने के दर्जे पर कोई फैसला देने से अलग रखते हुए यह संकेत दिया कि इसे न गाने पर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं, इस संवैधानिक सवाल की जांच की जाएगी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा है।
छह छंदों को अनिवार्य करने को दी गई चुनौती
टीएम कृष्णा की याचिका में वंदे मातरम् के छह छंदों को गाने की अनिवार्यता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि गीत के अंतिम चार छंदों में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति भक्ति का उल्लेख आता है। याचिका में कहा गया है कि इन छंदों को गाना अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से जुड़े सवाल खड़े करता है।
याचिका में उस व्यवस्था को भी चुनौती दी गई है जिसके तहत वंदे मातरम् को Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 के दायरे में लाए जाने का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने दंडात्मक प्रावधानों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में जांचने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान पीठ ने वंदे मातरम् के राष्ट्रीय गीत होने और इसे न गाने पर दंड दिए जाने के सवाल को अलग-अलग करके देखने का संकेत दिया। कोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय गीत की स्थिति क्या है, यह एक अलग प्रश्न है, जबकि किसी व्यक्ति को उसे गाने से इनकार करने पर दंडित किया जा सकता है या नहीं, यह संवैधानिक समीक्षा का विषय हो सकता है।
कोर्ट ने विशेष रूप से बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले का उल्लेख किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे स्कूली बच्चों के अधिकारों पर विचार किया था, जिन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार किया था, जबकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।
मौजूदा सुनवाई में भी पीठ ने इसी संवैधानिक सिद्धांत के संदर्भ में दंडात्मक प्रावधानों की समीक्षा की आवश्यकता पर संकेत दिया।
अनुच्छेद 25 और 26 का क्या है महत्व?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कानून के तहत दंड के प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिए गए अधिकारों के संदर्भ में देखा जा सकता है।
अनुच्छेद 25 नागरिकों को अंत:करण की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन से संबंधित अधिकार प्रदान करता है।
हालांकि, इन संवैधानिक प्रावधानों का मौजूदा मामले में अंतिम रूप से कैसे इस्तेमाल होगा, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
किसने दायर की याचिका?
यह याचिका कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टीएम कृष्णा ने दायर की है। याचिका में वंदे मातरम् के छह छंदों को अनिवार्य रूप से गाने और इसके पालन से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलीलें रखीं। उनका मुख्य तर्क दंडात्मक प्रावधानों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा रहा। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या किसी व्यक्ति को किसी गीत के कुछ हिस्से गाने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य किया जा सकता है।
केंद्र सरकार की ओर से क्या दलील दी गई?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने याचिका का विरोध किया। सुनवाई के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय गीत और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी ऐतिहासिक भूमिका से जुड़े तर्क रखे।
सुनवाई के दौरान उनकी एक टिप्पणी को लेकर याचिकाकर्ता की ओर से आपत्ति भी दर्ज कराई गई। इस पर अदालत में कुछ देर बहस हुई। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने कहा कि उसने संबंधित टिप्पणी का संज्ञान नहीं लिया है।
अभी क्या तय हुआ है?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह फैसला नहीं सुनाया है कि वंदे मातरम् न गाना दंडनीय अपराध है या नहीं। अदालत ने केवल यह स्पष्ट किया है कि दंडात्मक परिणामों से जुड़े संवैधानिक सवाल की जांच की जाएगी।
केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब मांगा गया है। इसलिए इस मामले में आगे होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल वंदे मातरम् की स्थिति, उसके छंदों और किसी व्यक्ति को इसे गाने के लिए बाध्य करने से जुड़े अलग-अलग कानूनी प्रश्न अदालत के सामने हैं।
बिजो एमैनुएल केस क्यों महत्वपूर्ण है?
इस मामले में बिजो एमैनुएल फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और किसी व्यक्ति की अंतरात्मा एवं धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन का सवाल महत्वपूर्ण है।
मौजूदा मामले में अदालत इसी पूर्व निर्णय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए यह देख सकती है कि वंदे मातरम् से संबंधित किसी कानूनी व्यवस्था में दंड का प्रावधान मौलिक अधिकारों के अनुरूप है या नहीं।
अभी इस मुद्दे पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना बाकी है।
वंदे मातरम् न गाना क्या दंडनीय अपराध है, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई में दंडात्मक पहलू की संवैधानिक समीक्षा का रास्ता खोला है। हालांकि, अदालत ने अभी यह घोषित नहीं किया है कि वंदे मातरम् गाना अनिवार्य है या इसके इनकार पर दंड दिया जा सकता है।
अब केंद्र सरकार के जवाब और मामले की आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि वंदे मातरम् से जुड़े मौजूदा दंडात्मक प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की कसौटी पर किस तरह परखा जाता है।
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