“इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 30 साल तक सेवा लेने के बाद सरकार कर्मचारी को केवल पद न होने के आधार पर पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ से वंचित नहीं कर सकती। कोर्ट ने 30 दिनों में भुगतान का आदेश दिया।“
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति लाभ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार किसी कर्मचारी से करीब तीन दशकों तक लगातार सेवा लेती रही है, तो बाद में केवल तकनीकी आधार या स्वीकृत पद उपलब्ध न होने का हवाला देकर उसे पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि लंबे समय तक कर्मचारी से सेवा लेने के बाद उसके सेवानिवृत्ति लाभों को केवल नियुक्ति के तकनीकी आधार पर रोकना उचित नहीं है। कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को कर्मचारी के सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर निर्धारित समय सीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
बालकृष्ण शर्मा की विशेष अपील पर फैसला
यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बालकृष्ण शर्मा की विशेष अपील पर सुनाया। मामले में अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता विभु राय ने पक्ष रखा, जबकि सरकार की ओर से सरकारी वकील ने अदालत में पक्ष रखा।
खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ के 31 अगस्त 2012 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें याची की सेवा समाप्ति को सही ठहराया गया था।
1997 में कनिष्ठ लिपिक के पद पर हुआ था चयन
मामले के अनुसार, वर्ष 1997 में कनिष्ठ लिपिक के दो सामान्य पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार आयोजित किए गए। 31 जुलाई 1997 को जारी चयन सूची में बालकृष्ण शर्मा का नाम दूसरे स्थान पर था।
इसके बाद 12 सितंबर 1997 को उन्हें नियुक्ति पत्र जारी किया गया और उन्होंने अपनी सेवा शुरू कर दी। हालांकि, चयन प्रक्रिया पूरी होने के दौरान विज्ञापित दो पदों में से एक पद पर मृतक आश्रित कोटे के तहत नियुक्ति कर दी गई थी। मेरिट में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी को दूसरे पद पर नियुक्त किया गया।
इसके बाद विभाग ने बालकृष्ण शर्मा की नियुक्ति को अवकाश रिक्ति के तहत बताते हुए कहा कि नियमित पद उपलब्ध नहीं था। इसी आधार पर 13 सितंबर 2000 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
‘खेल के नियम बीच में नहीं बदले जा सकते’
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया और उसके बाद कर्मचारी से ली गई सेवा के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने बाकायदा विज्ञापन जारी किया, चयन प्रक्रिया पूरी की और नियुक्ति पत्र जारी करके कर्मचारी से काम लिया, तो बाद में नियुक्ति को केवल तकनीकी आधार पर चुनौती देना उचित नहीं है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमों को बीच में नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी उल्लेख किया।
न्यायालय ने यह भी कहा कि संविदा या अस्थायी व्यवस्था का अनुचित इस्तेमाल कर कर्मचारियों के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, पारदर्शी चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद कर्मचारी को अपनी सेवा के संबंध में वैध अपेक्षा थी।
करीब तीन दशक तक लगातार सेवा का मामला
हाईकोर्ट ने पाया कि बालकृष्ण शर्मा 12 सितंबर 1997 से लगातार कार्यरत रहे। वह 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंच गए।
कोर्ट ने कहा कि जब किसी कर्मचारी से इतने लंबे समय तक सेवा ली गई हो और वह बिना किसी शिकायत के सेवानिवृत्ति की स्थिति तक पहुंच गया हो, तो उसे पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति देयों से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने इस मामले में लंबे समय तक ली गई सेवा और कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभों के अधिकार को महत्वपूर्ण माना।
30 दिनों में भुगतान का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदेश सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि बालकृष्ण शर्मा के सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना सामान्य सरकारी कर्मचारी के लिए लागू नियमों के अनुसार की जाए।
इसमें पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य संबंधित सेवानिवृत्ति देय शामिल हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर सभी देयों का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
फैसले में सेवा की लंबी अवधि को दिया गया महत्व
इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश का प्रमुख पहलू यह रहा कि कर्मचारी ने करीब तीन दशक तक सेवा की और अंततः सेवानिवृत्ति की स्थिति तक पहुंचा। अदालत ने केवल इस आधार पर सेवानिवृत्ति लाभ रोकने को उचित नहीं माना कि नियुक्ति के समय संबंधित पद को लेकर विभागीय स्थिति अलग थी।
फैसले के बाद अब संबंधित विभाग को कर्मचारी की सेवा और सेवानिवृत्ति लाभों की गणना लागू सरकारी नियमों के तहत करनी होगी तथा निर्धारित समय सीमा में भुगतान करना होगा।
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