यूपी में एंबुलेंस के नाम पर बड़ा खेल! 4789 वाहनों की जांच में खुलीं खामियां, परिवहन विभाग की कार्रवाई

“यूपी में अवैध एंबुलेंस के खिलाफ परिवहन विभाग की कार्रवाई में 4789 वाहनों की जांच हुई। 186 अस्पतालों से अनुबंधित नहीं मिलीं, 772 का चालान और 135 बंद की गईं।“

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने वाली एंबुलेंस की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। परिवहन विभाग के विशेष जांच अभियान में प्रदेशभर में 186 ऐसी एंबुलेंस मिलीं, जो किसी सरकारी या निजी अस्पताल से अनुबंधित नहीं थीं। वहीं, 4,789 एंबुलेंस की जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन करने और तकनीकी कमियां पाए जाने पर 772 का चालान किया गया, जबकि 135 एंबुलेंस को बंद कराया गया।

राजधानी लखनऊ में भी एंबुलेंस की जांच के दौरान कई खामियां सामने आईं। यहां 10 एंबुलेंस खराब हालत में मिलीं और दो वाहनों को सीज किया गया। कुछ एंबुलेंस के फिटनेस और बीमा संबंधी दस्तावेज नहीं मिले, जबकि कुछ में मरीजों को जरूरी चिकित्सा सहायता देने वाले उपकरणों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई। ऐसे में आपातकालीन स्थिति में मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।

पांच से सात अक्टूबर तक चला विशेष जांच अभियान

परिवहन विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें और सूचनाएं मिल रही थीं कि प्रदेश की सड़कों पर बड़ी संख्या में अवैध और अनफिट एंबुलेंस संचालित हो रही हैं। इन वाहनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पांच से सात अक्टूबर तक विशेष अभियान चलाया गया। अभियान के दौरान प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में एंबुलेंस के दस्तावेज, फिटनेस और अन्य जरूरी मानकों की जांच की गई।

अपर परिवहन आयुक्त प्रवर्तन केडी सिंह के मुताबिक, अभियान के दौरान कुल 4,789 एंबुलेंस की जांच की गई। नियमों का उल्लंघन करने और अनफिट पाए जाने पर 772 एंबुलेंस का चालान किया गया, जबकि 135 को बंद कराया गया। जांच में 381 एंबुलेंस अनफिट मिलीं। इनमें फिटनेस, बीमा और प्रदूषण प्रमाणपत्र से संबंधित कमियों के साथ मेडिकल सपोर्ट सिस्टम में खामियां भी सामने आईं।

अधिकारियों के अनुसार, 186 एंबुलेंस ऐसी मिलीं, जो किसी सरकारी या निजी अस्पताल से अनुबंधित नहीं थीं। परिवहन विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस तरह की जांच आगे भी जारी रहेगी।

लखनऊ में 10 एंबुलेंस में मिलीं खामियां

राजधानी में जांच के दौरान 10 एंबुलेंस की हालत खराब पाई गई। इनमें चरक अस्पताल और हर्षा अस्पताल की एंबुलेंस के फिटनेस तथा बीमा संबंधी दस्तावेज नहीं मिले। जांच में सामने आई कमियों के आधार पर कार्रवाई की गई।

हालांकि, सभी वाहनों को सीज नहीं किया गया। खबर के मुताबिक, दो एंबुलेंस सीज की गईं, जबकि आठ वाहनों का चालान करके छोड़ दिया गया। अधिकारियों ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि इन एंबुलेंस में मरीज और उनके तीमारदार मौजूद थे। ऐसे में मरीजों को तत्काल परेशानी से बचाने के लिए वाहनों को चालान के बाद जाने दिया गया।

यह स्थिति बताती है कि एंबुलेंस के दस्तावेज और तकनीकी फिटनेस की जांच के साथ-साथ आपातकालीन सेवाओं को बाधित किए बिना कार्रवाई करना भी विभाग के सामने एक चुनौती है।

केजीएमयू की एंबुलेंस के दस्तावेजों पर सवाल

लखनऊ में जांच के दौरान किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) की एक एंबुलेंस भी चर्चा में आई। वाहन संख्या यूपी 32 एफएन 0847 के संबंध में सामने आया कि उसका नौ साल से फिटनेस, प्रदूषण और बीमा संबंधी रिकॉर्ड नहीं मिला।

खबर के मुताबिक, कार्रवाई के दौरान चालक वाहन को लॉक करके चला गया, जिसके कारण एंबुलेंस को सीज नहीं किया जा सका। इस मामले को विश्वविद्यालय प्रशासन के संज्ञान में लाया गया है।

केजीएमयू के प्रवक्ता प्रो. केके सिंह ने बताया कि कुलपति ने मामले को गंभीरता से लिया है। जांच के लिए एक समिति गठित की गई है, जो एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अनफिट एंबुलेंस से मरीजों की सुरक्षा पर खतरा

एंबुलेंस का काम केवल मरीज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना नहीं है। गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाते समय कई बार रास्ते में ही ऑक्सीजन, हृदय गति की निगरानी और दूसरी चिकित्सकीय सहायता की जरूरत पड़ती है। ऐसे में वाहन की तकनीकी स्थिति और उसमें उपलब्ध उपकरण मरीज की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

यदि एंबुलेंस का फिटनेस प्रमाणपत्र, बीमा या प्रदूषण संबंधी दस्तावेज अधूरे हों अथवा जरूरी मेडिकल उपकरण ठीक से काम न कर रहे हों, तो आपातकालीन स्थिति में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि परिवहन विभाग के अभियान में मिली खामियां स्वास्थ्य सेवाओं और सड़क सुरक्षा दोनों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा हैं।

एंबुलेंस में कौन-कौन से उपकरण और सुविधाएं जरूरी?

मरीजों को सुरक्षित तरीके से अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस में आवश्यक चिकित्सा उपकरणों और सुरक्षा सुविधाओं का होना जरूरी है। जांच के दौरान मेडिकल सपोर्ट सिस्टम की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही।

प्रमुख जरूरी सुविधाओं में शामिल हैं:

  • ऑक्सीजन व्यवस्था: सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन, ऑटोमैटिक चेंजओवर और दो सिलेंडर।
  • मरीज की निगरानी: वेंटिलेटर, डीफिब्रिलेटर और मल्टी-पैरा मॉनिटर जैसी आवश्यक सुविधाएं, एंबुलेंस की श्रेणी और निर्धारित मानकों के अनुसार।
  • साफ-सफाई: मरीज के केबिन में एंटीबैक्टीरियल और एंटी-स्लिप सतह, जिसे आसानी से सैनिटाइज किया जा सके।
  • एयर कंडीशनिंग: मरीज के केबिन के लिए स्वतंत्र एसी व्यवस्था।
  • सुरक्षा: चालक और मरीज के हिस्से के बीच मजबूत विभाजन तथा स्ट्रेचर को स्थिर रखने वाला लॉकिंग सिस्टम।
  • बिजली का बैकअप: मेडिकल उपकरणों के लिए अलग इनवर्टर और बैटरी बैकअप।
  • आपातकालीन संकेत: छत पर चमकदार एलईडी लाइट, मल्टीटोन सायरन और वाहन पर स्पष्ट एंबुलेंस संकेत।
  • रात में दृश्यता: वाहन के पीछे और किनारों पर दूर से दिखाई देने वाले चमकदार रेडियम स्टीकर।

इन सुविधाओं की उपलब्धता एंबुलेंस के प्रकार और लागू नियमों के अनुसार सुनिश्चित की जानी चाहिए।

आगे भी जारी रहेगा जांच अभियान

परिवहन विभाग की कार्रवाई में प्रदेशभर में बड़ी संख्या में एंबुलेंस में दस्तावेजी और तकनीकी खामियां सामने आई हैं। बिना अस्पताल अनुबंध के चल रही एंबुलेंस, अनफिट वाहन और मेडिकल सपोर्ट सिस्टम की कमियां मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाती हैं।

विभाग ने संकेत दिया है कि ऐसे वाहनों के खिलाफ अभियान आगे भी जारी रहेगा। वहीं, केजीएमयू की एंबुलेंस से जुड़े मामले में जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई की जाएगी। अब देखना होगा कि जांच और प्रवर्तन की यह प्रक्रिया प्रदेश में एंबुलेंस सेवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने में कितनी प्रभावी साबित होती है।

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