“मोहन भागवत ने संत मलूक दास की जयंती पर कहा कि समाज को गौभक्त बनाया जाए तो गौहत्या अपने आप रुक जाएगी। कार्यक्रम में बाबा रामदेव भी शामिल हुए।“
वृंदावन। वृंदावन स्थित मलूक पीठ में संत मलूक दास की 452वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने संतों का आशीर्वाद लिया और समाज में गौ-जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
‘समाज बदलेगा तो व्यवस्था बदलेगी’
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि यदि समाज को गौभक्त बनाया जाए, तो गौहत्या अपने आप रुक जाएगी। उन्होंने कहा कि आज सत्ता में बैठे लोग भी इस विषय को लेकर गंभीर हैं, लेकिन कई व्यावहारिक चुनौतियाँ सामने आती हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि—
- समाज में गौ-जागृति को मजबूत करना जरूरी है
- जब जनभावना तैयार होगी, तो व्यवस्था भी उसे स्वीकार करेगी
संत परंपरा के अनुकरण पर बल
भागवत ने कहा कि भारत की संत परंपरा समाज को सही दिशा दिखाने में सक्षम है।
“समाज जैसा बनेगा, देश भी वैसा ही बनेगा। इसलिए हमें संतों के विचारों और जीवन से प्रेरणा लेकर अपने आचरण में बदलाव लाना होगा,” उन्होंने कहा।
‘भारत विश्व का मार्गदर्शक बनेगा’
उन्होंने कहा कि भारत विश्व की आत्मा है और जब भारत पूर्ण वैभव के साथ आगे बढ़ेगा, तो पूरी दुनिया को दिशा मिलेगी।
“आज विश्व अपनी आत्मा से भटक रहा है, ऐसे में भारत को विश्व गुरु बनकर आगे आना होगा,” उन्होंने कहा।
राम मंदिर उदाहरण से समझाया जनभावना का महत्व
भागवत ने कहा कि किसी भी बड़े बदलाव के लिए जनभावना का मजबूत होना आवश्यक है। उन्होंने राम मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि जब देश की भावना उससे जुड़ी, तभी उसका निर्माण संभव हो सका।
इसी प्रकार गौ-संरक्षण के मुद्दे पर भी जनसमर्थन बढ़ेगा, तो समाधान स्वतः निकल आएगा।
संतों का सम्मान, धार्मिक कार्यक्रम में सहभागिता
कार्यक्रम के दौरान संत रसिक माधव दास ने मोहन भागवत का शाल ओढ़ाकर स्वागत किया। उन्होंने संतों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया।
योग गुरु बाबा रामदेव भी कार्यक्रम में शामिल हुए और संत मलूक दास की समाधि पर दर्शन-पूजन किया।
संत मलूक दास: भक्ति और सरल जीवन का संदेश
मलूक दास का जन्म कौशांबी में हुआ था और उन्होंने वृंदावन को अपनी साधना स्थली बनाया। उनका प्रसिद्ध दोहा—
“अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम”
आज भी लोगों को सरल जीवन और ईश्वर पर विश्वास का संदेश देता है।
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