“मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल के एसएनसीयू में छह महीने के दौरान 80 नवजातों की मौत का मामला सामने आया है। जांच में कम वजन और समय से पहले जन्म प्रमुख स्थितियों के रूप में सामने आईं। शिकायत के बाद एसएनसीयू प्रभारी बदले गए।“
सिवनी (मध्य प्रदेश)। मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में नवजातों की मौत का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हलचल मच गई है। अस्पताल के एसएनसीयू में एक अप्रैल से 30 सितंबर के बीच भर्ती किए गए 1,088 नवजातों में से 80 की मौत हो गई। मामले में लापरवाही की शिकायत सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच कराई और एसएनसीयू के प्रभारी को पद से हटा दिया। अब इस इकाई की जिम्मेदारी दूसरे शिशु रोग विशेषज्ञ को सौंपी गई है।
मामला सामने आने के बाद नवजातों को मिलने वाली चिकित्सा सुविधाओं, उपचार व्यवस्था और देखभाल की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच में मृत नवजातों में कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों की संख्या अधिक पाई गई। वहीं, मामले की गंभीरता को देखते हुए चार सदस्यीय जांच दल गठित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
विधायक के औचक निरीक्षण के बाद उठा मामला
सिवनी से भाजपा विधायक दिनेश राय मुनमुन ने जिला अस्पताल का औचक निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने एसएनसीयू में नवजातों की मौत और उनकी देखभाल में कथित लापरवाही को लेकर चिंता जताई। विधायक के अनुसार, उन्हें अस्पताल में नवजातों की मौत और उपचार व्यवस्था से जुड़ी लगातार शिकायतें मिल रही थीं।
विधायक ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने मामले की जांच शुरू कराई। शिकायत के बाद हुई कार्रवाई से अस्पताल की नवजात देखभाल व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
छह महीने में 1,088 नवजात भर्ती, 80 की मौत
स्वास्थ्य विभाग की ओर से की गई जांच के अनुसार, एक अप्रैल से 30 सितंबर तक सिवनी जिला अस्पताल के एसएनसीयू में कुल 1,088 नवजातों को भर्ती कराया गया था। इनमें से 80 बच्चों की मौत हुई। इस अवधि में भर्ती नवजातों में से लगभग 7.35 प्रतिशत की मृत्यु दर्ज की गई।
जांच में सामने आया कि मृत नवजातों में 60 का वजन सामान्य से कम था। इनमें से 44 बच्चों का वजन 400 से 1,500 ग्राम के बीच था। कम वजन के कारण ऐसे बच्चों को विशेष देखभाल और गहन चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता होती है। हालांकि, केवल कम वजन के आंकड़ों के आधार पर सभी मौतों का कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रत्येक मामले के चिकित्सकीय रिकॉर्ड और उपचार की परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी है।
58 नवजात समय से पहले जन्मे थे
जांच में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, मृत 80 नवजातों में से 58 का जन्म समय से पहले हुआ था। शेष 22 बच्चों को जन्म के दौरान मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचने और रक्त संचार में बाधा जैसी गंभीर स्थितियों के कारण एसएनसीयू में भर्ती कराया गया था।
समय से पहले जन्मे और बेहद कम वजन वाले बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का जोखिम अधिक रहता है। ऐसे नवजातों को तापमान नियंत्रित रखने, सांस लेने में सहायता, संक्रमण से बचाव और लगातार निगरानी जैसी सुविधाओं की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए एसएनसीयू में उपलब्ध संसाधनों, विशेषज्ञों की तैनाती और उपचार प्रक्रिया की समीक्षा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
एसएनसीयू प्रभारी को हटाया, दूसरे डॉक्टर को मिली जिम्मेदारी
मामले की जांच के बाद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. पंकज दुबे ने एसएनसीयू के प्रभार में बदलाव का आदेश जारी किया। डॉ. पारस पटेरिया के स्थान पर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद दहायत को एसएनसीयू की जिम्मेदारी सौंपी गई।
यह प्रशासनिक कार्रवाई नवजातों की मौत और देखभाल व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों के बीच की गई है। हालांकि, प्रभारी बदले जाने को अपने आप में किसी डॉक्टर की व्यक्तिगत लापरवाही का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए जांच के निष्कर्ष और संबंधित मामलों के चिकित्सकीय तथ्यों को देखना आवश्यक होगा।
नवजातों की मौत के मामलों में विस्तृत जांच जरूरी
एसएनसीयू में भर्ती होने वाले नवजातों की स्थिति अक्सर गंभीर होती है। समय से पहले जन्म, बेहद कम वजन, जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी और संक्रमण जैसी परिस्थितियां बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। इसके बावजूद, लगातार हुई मौतों के मामलों में यह जांचना जरूरी है कि अस्पताल में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध थीं या नहीं और उपचार निर्धारित मानकों के अनुरूप किया गया या नहीं।
सिवनी जिला अस्पताल के मामले में भर्ती और मृत नवजातों के रिकॉर्ड, उनकी चिकित्सकीय स्थिति, उपचार की समयबद्धता, उपलब्ध उपकरणों और स्टाफ की व्यवस्था की समीक्षा अहम होगी। इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि मौतें मुख्य रूप से गंभीर चिकित्सकीय परिस्थितियों के कारण हुईं या देखभाल व्यवस्था में किसी कमी की भी भूमिका रही।
स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही पर उठे सवाल
सिवनी के जिला अस्पताल में छह महीने के भीतर 80 नवजातों की मौत का आंकड़ा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही को लेकर चिंता पैदा करता है। विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई का उद्देश्य गंभीर स्थिति में जन्मे बच्चों को समय पर उपचार और बेहतर निगरानी उपलब्ध कराना है।
ऐसे में जांच के निष्कर्षों के आधार पर आवश्यक सुधार करना, चिकित्सकीय सुविधाओं को मजबूत बनाना और नवजातों की देखभाल में किसी भी तरह की कमी को दूर करना महत्वपूर्ण होगा। मामले में प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब विस्तृत जांच के निष्कर्षों पर नजर रहेगी।
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