UP BJP में ब्राह्मण-राजपूत बैठकें: नीयत सही, परसेप्शन गलत

यूपी भाजपा में ब्राह्मण विधायकों के सहभोज और राजपूत विधायकों के कुटुंब सम्मेलन से गलत परसेप्शन बना। अब पार्टी संयुक्त गेट-टुगेदर से डैमेज कंट्रोल में जुटी है।

हाइलाइट्स :

  • ब्राह्मण विधायकों का सहभोज और राजपूत विधायकों का कुटुंब सम्मेलन चर्चा में
  • नीयत सही, लेकिन समय और परसेप्शन भाजपा के खिलाफ गया
  • विपक्ष को भाजपा के भीतर झांकने और बयानबाजी का मौका
  • सपा नेताओं ने विधायकों को पार्टी में आने का दिया ऑफर
  • भाजपा अब संयुक्त गेट-टुगेदर से डैमेज कंट्रोल की तैयारी में

अभयानंद शुक्ल
समन्वय सम्पादक

लखनऊ: राजनीति में नीयत से अधिक परसेप्शन मायने रखता है। कई बार सही सोच और सकारात्मक उद्देश्य भी अगर गलत समय और गलत संदर्भ में सामने आ जाए, तो उसका असर उल्टा पड़ता है। उत्तर प्रदेश भाजपा में हालिया घटनाक्रम ने यही सिद्ध किया है।

चाहे वह विधानसभा शीत सत्र के दौरान ब्राह्मण विधायकों का सहभोज हो या उससे पहले मानसून सत्र में राजपूत विधायकों का कुटुंब सम्मेलन, दोनों ही आयोजनों ने पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी। इन बैठकों से यह संदेश गया कि भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।

ब्राह्मण विधायकों का सहभोज ऐसे समय हुआ, जब राजधानी लखनऊ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की 101वीं जयंती पर राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल का लोकार्पण होना था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन की तैयारियां चल रही थीं। ऐसे समय में इस बैठक ने अनावश्यक रूप से राजनीतिक हलचल को जन्म दिया।

भले ही यह बैठक किसी गलत नीयत से न की गई हो, लेकिन समय की चूक ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। विपक्ष को मौका मिला और उसने तुरंत इस पर टिप्पणी शुरू कर दी। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने खुले तौर पर ब्राह्मण विधायकों को सपा में शामिल होने का प्रस्ताव तक दे डाला।

उन्होंने यहां तक कह दिया कि भाजपा सवर्ण समाज का भी ध्यान नहीं रख पा रही है और उन्हें केवल इस्तेमाल किया जा रहा है। यानी एक बैठक ने ऐसा नैरेटिव गढ़ दिया कि भाजपा के भीतर असंतोष है।

इससे पहले राजपूत विधायकों के कुटुंब सम्मेलन ने भी यही संदेश दिया था कि पार्टी में उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। उस समय भी यही सफाई दी गई थी कि यह राजनीतिक बैठक नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यक्रम था। लेकिन परसेप्शन वही बना—दबाव बनाने की कोशिश।

अब सवाल उठ रहे हैं कि जब राजपूत विधायकों की बैठक हुई थी, तब नेतृत्व की सख्ती क्यों नहीं दिखी? सोशल मीडिया पर तब “कुटुंब-कुटुंब” चलता रहा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, ब्राह्मण विधायकों के सहभोज पर हंगामा खड़ा हो गया।

नाम न छापने की शर्त पर कुछ ब्राह्मण विधायकों का कहना है कि वे न तो योगी विरोधी हैं और न ही मोदी विरोधी, वे केवल सम्मान और संवाद चाहते हैं। उनका सवाल है कि अगर ब्राह्मणों का साथ बैठना गलत है, तो राजपूतों का कुटुंब कैसे सही हो सकता है।

इन घटनाओं के बाद भाजपा अब डैमेज कंट्रोल मोड में आ गई है। खबर है कि जल्द ही ब्राह्मण और क्षत्रिय विधायकों का संयुक्त गेट-टुगेदर कराया जाएगा, ताकि एकता का संदेश दिया जा सके। शुरुआत संयुक्त सहभोज से हो सकती है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने आगे से जाति आधारित बैठकों पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि दूसरी ओर यह भी चर्चा है कि जनवरी के पहले सप्ताह में एक पत्रकार से नेता बने भाजपा विधायक के आवास पर ब्राह्मण विधायकों की अगली बैठक प्रस्तावित है, जिसमें अन्य दलों के ब्राह्मण सांसदों को भी बुलाया जा सकता है।

कुल मिलाकर, भाजपा के लिए यह घटनाक्रम एक सबक है कि राजनीति में सिर्फ नीयत ही नहीं, समय और संदेश भी उतने ही अहम होते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button