पश्चिम बंगाल SIR विवाद: चुनाव आयोग ने 7 अफसरों को किया निलंबित

ECI West Bengal SIR Action के तहत चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में 7 अधिकारियों को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में लापरवाही और पावर के दुरुपयोग के आरोप में सस्पेंड किया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बदली टाइमलाइन, जानें पूरा मामला।

हाइलाइट्स:

  • Election Commission of India (ECI) ने पश्चिम बंगाल के 7 अधिकारियों को सस्पेंड किया
  • SIR प्रक्रिया में गंभीर कदाचार और लापरवाही का आरोप
  • मुख्य सचिव को अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश
  • Supreme Court of India ने अंतिम मतदाता सूची जारी करने की समयसीमा बढ़ाई
  • DGP को कारण बताओ नोटिस जारी

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) अभियान के दौरान कथित अनियमितताओं को लेकर बड़ा प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। Election Commission of India (ईसीआई) ने गंभीर लापरवाही और वैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

निलंबित अधिकारियों में विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (AEROs) और ब्लॉक स्तर के संबंधित अधिकारी शामिल हैं। आयोग का कहना है कि प्रारंभिक जांच में पाया गया कि विशेष पुनरीक्षण के दौरान दस्तावेजों की समुचित जांच नहीं की गई, दावों और आपत्तियों के निस्तारण में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और कुछ मामलों में अधिकारों का दुरुपयोग भी सामने आया।

आयोग ने इस कार्रवाई के साथ ही राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रारंभ की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में पुनरीक्षण प्रक्रिया पूर्ण पारदर्शिता और नियमों के अनुरूप संचालित हो। सूत्रों के अनुसार, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की त्रुटि या अनियमितता लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है, इसलिए इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इस पूरे घटनाक्रम में Supreme Court of India का भी हस्तक्षेप हुआ है। शीर्ष अदालत ने अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की समयसीमा में एक सप्ताह का विस्तार देते हुए कहा कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) और AERO को दस्तावेजों की गहन जांच तथा प्राप्त दावों-आपत्तियों के निस्तारण के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है, इसलिए प्रक्रिया में जल्दबाजी के बजाय सटीकता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

साथ ही, अदालत ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को रिवीजन प्रक्रिया के दौरान कथित हिंसा और चुनावी अभिलेख जलाने के आरोपों पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने राज्य प्रशासन से पूछा है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए और दोषियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई।

नई समय-सीमा के अनुसार 14 फरवरी तक नोटिस की सुनवाई पूरी की जाएगी। 21 फरवरी तक दस्तावेजों की समीक्षा और दावों का निस्तारण किया जाएगा। 25 फरवरी तक पोलिंग स्टेशनों का रेशनलाइजेशन (तार्किक पुनर्संरचना) किया जाएगा, 27 फरवरी तक स्वास्थ्य एवं अन्य प्रशासनिक मानकों की जांच (हेल्थ पैरामीटर चेक) पूरी की जाएगी और 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।

राजनीतिक दृष्टि से यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण किसी भी चुनाव से पहले एक अहम प्रक्रिया होती है, क्योंकि इसी के आधार पर मतदान का अधिकार सुनिश्चित होता है। यदि सूची में त्रुटियां रह जाती हैं तो पात्र मतदाता वंचित हो सकते हैं या अपात्र नाम शामिल रह सकते हैं, जिससे चुनावी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आयोग की यह सख्त कार्रवाई आगामी चुनावों से पहले स्पष्ट संदेश है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से यह संकेत मिलता है कि न्यायपालिका भी चुनावी शुचिता के मुद्दे पर गंभीर है। आने वाले दिनों में विभागीय जांच और अदालत की अगली सुनवाई इस मामले की दिशा तय करेगी, लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर सख्ती बढ़ गई है।

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