सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी—‘धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की जांच का अधिकार हमारे पास’

सती प्रथा और जादू-टोना का दिया उदाहरण; सरकार बोली—धार्मिक ज्ञान के बिना अदालत तय नहीं कर सकती अंधविश्वास

सबरीमाला केस सुप्रीम कोर्ट सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि उसे धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की जांच का अधिकार है। जानें सती प्रथा का जिक्र क्यों हुआ और सरकार का पक्ष क्या है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को यह अधिकार है कि वह किसी धार्मिक प्रथा में अंधविश्वास है या नहीं, इसकी जांच कर सके।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत अपने अधिकारों से पीछे नहीं हट सकती। अदालत यह तय कर सकती है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, हालांकि आगे उस पर कानून बनाना संसद का कार्य हो सकता है।

सती प्रथा का क्यों हुआ जिक्र?

सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने तर्क को स्पष्ट करने के लिए सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसे उदाहरणों का उल्लेख किया। कोर्ट का कहना था कि अगर किसी प्रथा को धर्म का हिस्सा बताकर समाज पर थोप दिया जाए, लेकिन वह मानवता, नैतिकता या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

न्यायाधीशों ने सवाल उठाया कि यदि कोई प्रथा स्पष्ट रूप से गलत है—जैसे सती प्रथा—तो क्या अदालत केवल इस आधार पर चुप रहे कि वह धार्मिक परंपरा है? इसी संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि अंधविश्वास और धार्मिक आस्था के बीच अंतर तय करना न्यायपालिका की जिम्मेदारी भी हो सकती है।

सरकार और कोर्ट के बीच बहस

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि क्या अंधविश्वास है, क्योंकि न्यायालय धार्मिक विशेषज्ञ नहीं होता। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समाजों और क्षेत्रों में मान्यताएं भिन्न होती हैं, इसलिए एक ही प्रथा को हर जगह समान रूप से नहीं देखा जा सकता।

इस पर अदालत ने पलटते हुए कहा कि यदि किसी प्रथा को धर्म के नाम पर जायज ठहराया जाए, तो क्या उसे बिना जांच के स्वीकार कर लिया जाना चाहिए?

अदालत के अधिकार और ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और अन्य न्यायाधीशों ने कहा कि अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर ऐसे मामलों में दखल दे सकती है।

वहीं, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) के सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि अदालत को यह भी देखना होगा कि संबंधित प्रथा उस धर्म के लिए कितनी अनिवार्य है।

मामला क्या है?

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर यह विवाद लंबे समय से चल रहा है। यह मामला महिलाओं के समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।

फिलहाल, इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है और यह मामला देश में धर्म, कानून और समानता के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।

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