Supreme Court Housewife Compensation Judgment 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताते हुए उनके घरेलू योगदान को मान्यता दी। सड़क दुर्घटना मामले में कोर्ट ने घरेलू देखभाल के नुकसान के लिए अलग मुआवजा देने का निर्देश दिया और 30,000 रुपये प्रति माह का मानक तय किया।
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने गृहिणियों की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए उन्हें “राष्ट्र निर्माता” बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणियां केवल परिवार की देखभाल ही नहीं करतीं, बल्कि मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसलिए उनके श्रम और घरेलू सेवाओं का मूल्यांकन सम्मानजनक तरीके से किया जाना चाहिए।
गुरुवार को सुनाए गए एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटनाओं में गृहिणी की मृत्यु होने पर उसके द्वारा परिवार को दी जाने वाली घरेलू सेवाओं और देखभाल के नुकसान को मुआवजे का अलग आधार माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नुकसान केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
सड़क दुर्घटना मामले में आया फैसला
यह मामला एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मृत्यु हो गई थी। मृतका के पति और बच्चों ने मुआवजे की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने परिवार को आठ लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर अदालत ने गृहिणी की घरेलू भूमिका और उसके आर्थिक महत्व पर विस्तार से विचार किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण और परिवार के दैनिक प्रबंधन में गृहिणी की भूमिका को केवल पारंपरिक जिम्मेदारी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
‘राष्ट्र निर्माण में योगदान देती हैं गृहिणियां’
जस्टिस Sanjay Karol और N K Singh की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि गृहिणियां व्यक्ति और राष्ट्र दोनों की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि गृहिणी का कार्य देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अदालत ने उम्मीद जताई कि अब गृहिणियों को केवल घरेलू महिला नहीं, बल्कि “राष्ट्र निर्माता” के रूप में भी पहचान मिलेगी।
घरेलू देखभाल के नुकसान का आर्थिक मूल्य तय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गृहिणी द्वारा परिवार को प्रदान की जाने वाली घरेलू सेवाओं के नुकसान का न्यूनतम मूल्यांकन 30 हजार रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया। अदालत ने कहा कि मोटर वाहन दुर्घटना दावों में यह राशि मुआवजे की गणना के लिए एक अलग आधार के रूप में मानी जाएगी।
पीठ ने कहा कि घरेलू देखभाल का नुकसान उन अन्य मदों से अलग होगा, जिनका उल्लेख पहले के महत्वपूर्ण निर्णयों में किया गया है। इससे दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायसंगत मुआवजा मिल सकेगा।
मुआवजा निर्धारण में आएगा बड़ा बदलाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में मोटर वाहन दुर्घटना मामलों में मुआवजे की गणना की प्रक्रिया को प्रभावित करेगा। अब गृहिणियों के योगदान को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी मान्यता मिलेगी।
इस फैसले से उन हजारों परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनकी आजीविका और पारिवारिक व्यवस्था किसी गृहिणी की असामयिक मृत्यु के कारण प्रभावित होती है।
हाईकोर्टों को भी दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से भी मोटर वाहन अधिनियम से जुड़े मामलों की प्रक्रिया पर निगरानी रखने को कहा है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में मुआवजा तय करते समय गृहिणियों की भूमिका का उचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
महिलाओं के योगदान को मिली नई पहचान
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल कानूनी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से गृहिणियों के अदृश्य श्रम और योगदान को आर्थिक मान्यता देने की मांग उठती रही है। अदालत की यह टिप्पणी महिलाओं के घरेलू कार्यों के महत्व को स्वीकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय समाज में गृहिणियों की भूमिका को लेकर नई सोच विकसित करेगा और उनके योगदान को सम्मानजनक पहचान दिलाने में मददगार साबित होगा।
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