इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की बार-बार हड़ताल पर सख्त टिप्पणी करते हुए स्थायी समाधान की आवश्यकता बताई है। SRN अस्पताल में डॉक्टर–वकील मारपीट और अधिवक्ता जागृति शुक्ला की मौत मामले में न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं।
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की बार-बार होने वाली हड़ताल पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसका स्थायी समाधान निकालना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने साफ किया कि मरीजों की चिकित्सा सेवा बाधित होना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
यह टिप्पणी स्वरूप रानी नेहरू (एसआरएन) अस्पताल में डॉक्टरों और वकीलों के बीच हुई मारपीट तथा अधिवक्ता जागृति शुक्ला की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आई।
न्यायिक जांच का आदेश, रिटायर्ड जज करेंगे जांच
हाईकोर्ट ने पूरे मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अरुण टंडन को नियुक्त किया है। जांच में यह देखा जाएगा कि—
- क्या इलाज में लापरवाही हुई थी
- डॉक्टरों और वकीलों के बीच झड़प की जिम्मेदारी किसकी थी
- ट्रॉमा सेंटर में पुलिस और प्रशासन ने क्या कदम उठाए
- मरीज को समय पर उचित इलाज मिला या नहीं
जांच रिपोर्ट को 30 सितंबर 2026 तक सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
घटना कैसे बढ़ी तनाव में?
20 मई को झूंसी निवासी अधिवक्ता जागृति शुक्ला सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई थीं। इलाज के दौरान उन्हें एसआरएन अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज में लापरवाही के आरोप लगे।
इसी मुद्दे को लेकर डॉक्टरों और वकीलों के बीच विवाद बढ़ गया और मामला मारपीट तक पहुंच गया। बाद में अस्पताल में तनाव इतना बढ़ा कि डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी, जबकि वकीलों ने भी प्रदर्शन शुरू कर दिया।
स्थिति बिगड़ने पर पुलिस कार्रवाई हुई और कुछ डॉक्टरों को निलंबित भी किया गया। बाद में मरीज को लखनऊ SGPGI रेफर किया गया, जहां 8 जून को उनकी मृत्यु हो गई।
कोर्ट का सख्त रुख: हड़ताल और प्रदर्शन पर रोक
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि—
- सरकारी अस्पतालों में हड़ताल या धरना-प्रदर्शन जनहित के खिलाफ और आपराधिक प्रकृति का कार्य है
- किसी भी डॉक्टर, वकील या कर्मचारी द्वारा सेवाएं बाधित करने पर अवमानना कार्रवाई की जाएगी
- मरीजों की चिकित्सा सेवा और आपातकालीन व्यवस्था हर हाल में जारी रहनी चाहिए
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद (NMC) सरकारी अस्पतालों में हड़ताल रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
प्रशासनिक निर्देश और निगरानी
अदालत ने जिला प्रशासन, पुलिस और मेडिकल कॉलेज अधिकारियों को निर्देश दिया है कि—
- अस्पतालों में चिकित्सा सेवाएं बिना बाधा जारी रहें
- किसी भी तरह की हड़ताल या अव्यवस्था पर तुरंत कार्रवाई हो
- जांच आयोग को नियमित रिपोर्ट दी जाए
इस मामले ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर–मरीज और डॉक्टर–वकील विवादों की गंभीर स्थिति को उजागर किया है। हाईकोर्ट का रुख साफ है कि चिकित्सा सेवाओं में किसी भी तरह की बाधा अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी, और इसके लिए स्थायी व्यवस्था तैयार करनी होगी।
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