काशी में अनोखी मिसाल: 100 से ज्यादा मुस्लिमों ने ली गुरु दीक्षा, बोले- ‘यह हिंदू-मुस्लिम एकता का समाज है’

वाराणसी के पातालपुरी मठ में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 100 से ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गुरु दीक्षा ली। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे का संदेश दिया।

वाराणसी। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर धर्म और आस्था की नगरी काशी में हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी तस्वीर देखने को मिली। वाराणसी के पातालपुरी मठ में 100 से ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गुरु दीक्षा लेकर गुरु-शिष्य परंपरा में अपनी आस्था जताई।

गाजीपुर और मिर्जापुर से पहुंचे लोगों ने सिर पर टोपी लगाकर मठ में गुरु का पूजन किया, मंत्र प्राप्त किया और आशीर्वाद लिया। इस दौरान धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नजर नहीं आया और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल देखने को मिली।

गाजीपुर और मिर्जापुर से पहुंचे लोग

हर वर्ष की तरह इस बार भी गुरु पूर्णिमा के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पातालपुरी मठ पहुंचे। इनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी शामिल थे।

उन्होंने सनातन परंपरा के अनुसार अपने गुरु का पूजन किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। लोगों ने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा और आस्था किसी धर्म की सीमा में बंधी नहीं होती।

‘हमारे पूर्वज रामानंद संप्रदाय से जुड़े थे’

गाजीपुर से पहुंचे जाकिर ने बताया कि उनके पूर्वज रामानंद संप्रदाय के अनुयायी रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अपने गुरु बालक दास महाराज से आशीर्वाद लेने के लिए यहां पहुंचे हैं।

जाकिर ने कहा,
“हमारे लिए गुरु का स्थान सबसे ऊपर है। हम सभी यहां गुरु दीक्षा लेने आए हैं। यह संदेश देना चाहते हैं कि हमारा समाज हिंदू-मुस्लिम एकता का समाज है। हमें कट्टरता छोड़कर आपसी भाईचारे के साथ रहना चाहिए।”

‘हम पहले इंसान हैं, कट्टरता खत्म होनी चाहिए’

गुरु दीक्षा लेने पहुंचे अफरोज अहमद ने कहा कि धर्म के नाम पर समाज को बांटना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी लोग पहले इंसान हैं और आपसी प्रेम व सद्भाव ही सबसे जरूरी है।

उन्होंने कहा कि पातालपुरी मठ में आकर उन्हें आत्मिक शांति मिलती है। यहां वह गुरु की आरती करते हैं, पूजन करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

अफरोज ने कहा कि भारत की पहचान हमेशा से गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी एकता रही है।

बालकदास महाराज बोले- गुरु के लिए सभी समान

पातालपुरी मठ के बालकदास महाराज ने कहा कि यह जगद्गुरु रामानंदाचार्य की पीठ है, जहां कभी जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति लेकर आता है, उसका स्वागत किया जाता है। गुरु का संदेश सभी के लिए समान होता है।

बालकदास महाराज ने कहा कि यहां आने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता का संदेश दे रहे हैं। यह उन लोगों के लिए भी जवाब है जो समाज में विभाजन की सोच रखते हैं।

काशी ने दिया भाईचारे का संदेश

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पातालपुरी मठ में हुई यह पहल काशी की सांस्कृतिक परंपरा और आपसी सद्भाव को दर्शाती है। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा गुरु दीक्षा लेने की तस्वीरों ने एक बार फिर काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति को सामने रखा।

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