जेपीएनआईसी घोटाले की जांच फिर तेज, एलडीए के तत्कालीन चीफ इंजीनियर और अधिशासी अभियंता तलब

लखनऊ के जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (जेपीएनआईसी) परियोजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच एक बार फिर तेज हो गई है। एलडीए के तत्कालीन मुख्य अभियंता और अधिशासी अभियंता को 7 जुलाई को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए तलब किया गया है।

लखनऊ। समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान शुरू हुई महत्वाकांक्षी जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (जेपीएनआईसी) परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। परियोजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच को शासन ने तेज कर दिया है। इसी क्रम में लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के तत्कालीन मुख्य अभियंता और अधिशासी अभियंता को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए तलब किया गया है।

शासन के निर्देश पर चल रही विभागीय जांच के तहत एलडीए के तत्कालीन मुख्य अभियंता डीपी सिंह और अधिशासी अभियंता पूरन कुमार को आगामी 7 जुलाई को मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं।

सपा सरकार के कार्यकाल में बना था जेपीएनआईसी

जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर का निर्माण वर्ष 2013 से 2016 के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में कराया गया था। इसे प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में शामिल किया गया था।

करीब 22 एकड़ क्षेत्र में फैली इस परियोजना में कन्वेंशन सेंटर, विशाल ऑडिटोरियम, प्रदर्शनी हॉल, संग्रहालय, पुस्तकालय, वीआईपी सुविधाएं, फूड कोर्ट, व्यावसायिक परिसर और बहुस्तरीय पार्किंग जैसी आधुनिक सुविधाओं की परिकल्पना की गई थी।

लागत बढ़ने पर उठे थे सवाल

परियोजना की शुरुआती लागत लगभग 617 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी, लेकिन समय के साथ इसमें लगातार संशोधन किए गए और परियोजना की लागत बढ़कर लगभग 850 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

आरोप है कि मूल डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) में कई बार बदलाव किए गए, जिसके चलते परियोजना की लागत में भारी वृद्धि हुई। बाद में कुल व्यय लगभग 864 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात भी सामने आई।

वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतों के बाद वर्ष 2017 में सरकार बदलने के साथ ही परियोजना की समीक्षा और जांच शुरू की गई थी।

डीपीआर में बदलाव और दस्तावेजों के गायब होने की जांच

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि परियोजना से जुड़ी मूल डीपीआर उपलब्ध नहीं है। करीब दो वर्ष पहले शासन ने एलडीए को पत्र भेजकर डीपीआर गायब होने के मामले में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए थे।

अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि परियोजना की मूल रूपरेखा में कब और किन परिस्थितियों में बदलाव किए गए तथा इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन थे।

बताया जा रहा है कि जिन अधिकारियों के कार्यकाल में डीपीआर में संशोधन किए गए, उन्हीं से अब विस्तृत पूछताछ की जाएगी।

अधिकारियों को दिया गया अंतिम अवसर

अधिशासी अभियंता रहे पूरन कुमार के खिलाफ उत्तर प्रदेश विकास प्राधिकरण केंद्रीकृत सेवा नियमावली के तहत कार्रवाई की जा रही है, जबकि सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता डीपी सिंह के खिलाफ सिविल सेवा नियमावली के अनुच्छेद 351-ए के अंतर्गत विभागीय कार्रवाई प्रस्तावित है।

शासन की ओर से दोनों अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया गया है। व्यक्तिगत सुनवाई के बाद जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपेंगे, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

अधूरी परियोजना को पूरा करने के लिए अभी भी चाहिए 150 करोड़

जेपीएनआईसी परियोजना का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पूरी तरह से संचालित नहीं हो सका है। अधिकारियों के अनुसार, परियोजना को पूरी तरह शुरू करने और आवश्यक कार्यों को पूरा करने के लिए अभी लगभग 150 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता है।

इस कारण यह परियोजना वर्षों से अधूरी अवस्था में खड़ी है और इसकी उपयोगिता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

जेपीएनआईसी को लेकर सियासत भी रही गर्म

जेपीएनआईसी केवल वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक विवादों के कारण भी चर्चा में रहा है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव कई अवसरों पर इस परियोजना को अपनी सरकार की उपलब्धि बताते रहे हैं।

वहीं, वर्ष 2023 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान जेपीएनआईसी परिसर में प्रवेश को लेकर प्रशासन और समाजवादी पार्टी के बीच टकराव भी सामने आया था, जिसने इस परियोजना को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया था।

जांच के नतीजों पर टिकी निगाहें

करीब एक दशक पुरानी इस परियोजना से जुड़े वित्तीय और प्रशासनिक सवालों के बीच अब सभी की निगाहें जांच के निष्कर्षों पर टिकी हैं। यदि जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

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