“NEET पेपर लीक विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जहां ‘शिक्षा बनाम व्यवस्था’ का मुद्दा उठाकर युवाओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही हैं, वहीं भाजपा रोजगार, पारदर्शी भर्तियों और सुशासन के दावों के साथ जवाबी रणनीति पर काम कर रही है।“
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने युवाओं को केंद्र में रखकर अपनी चुनावी रणनीति तेज कर दी है। NEET पेपर लीक विवाद अब केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक विमर्श का प्रमुख मुद्दा बनता जा रहा है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस समेत विपक्षी दल इसे सरकार की व्यवस्था पर सवाल खड़े करने का अवसर मान रहे हैं, जबकि भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों और पूर्ववर्ती सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के जरिए जवाबी नैरेटिव तैयार कर रही है।
युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश
विपक्ष का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आए विवादों और पेपर लीक की घटनाओं से युवाओं में असंतोष बढ़ा है। इसी असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर हैं। विपक्ष इस मुद्दे को ‘शिक्षा बनाम व्यवस्था’ के रूप में पेश कर युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
सपा ने छात्र आंदोलन को बनाया राजनीतिक आधार
समाजवादी पार्टी पहले से ही शिक्षा, रोजगार और आरक्षण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भर्तियों में आरक्षण और पेपर लीक को लेकर लगातार सरकार को घेरा है। हाल के छात्र आंदोलनों और जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों में सपा की सक्रिय भागीदारी को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सांसद डिंपल यादव की मौजूदगी के जरिए भी पार्टी युवाओं के साथ खड़े होने का संदेश देने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस भी तलाश रही नई राजनीतिक जमीन
कांग्रेस भी इस मुद्दे को युवाओं से जुड़ने का अवसर मान रही है। पार्टी का मानना है कि शिक्षा और रोजगार जैसे विषयों पर सरकार को घेरकर वह उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर सकती है। छात्र आंदोलनों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मामलों में कांग्रेस लगातार सक्रिय नजर आ रही है।
भाजपा ने उपलब्धियों का खोला मोर्चा
विपक्ष के हमलों के बीच भाजपा ने भी अपनी रणनीति बदलते हुए सरकार की उपलब्धियों को प्रमुखता से सामने रखना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के अन्य नेता पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, रोजगार सृजन, स्टार्टअप नीति, कौशल विकास मिशन और सरकारी नौकरियों में हुई नियुक्तियों का उल्लेख कर युवाओं का भरोसा बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
इसके साथ ही भाजपा समाजवादी पार्टी की पिछली सरकारों के दौरान नकल माफिया, भर्ती घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों को भी लगातार उठाकर विपक्ष के आरोपों का जवाब दे रही है।
सोशल मीडिया पर भी छिड़ी नैरेटिव की जंग
राजनीतिक दलों की यह लड़ाई केवल सभाओं और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी दोनों पक्ष लगातार वीडियो, पोस्ट और अभियानों के जरिए युवाओं तक अपनी बात पहुंचाने में जुटे हैं। डिजिटल माध्यम चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं और राजनीतिक दल इसका पूरा उपयोग कर रहे हैं।
युवा वोटर बने चुनावी राजनीति का केंद्र
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में लाखों प्रतियोगी छात्र और पहली बार मतदान करने वाले युवा आगामी विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यही कारण है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही शिक्षा, रोजगार और भर्ती जैसे मुद्दों को चुनावी एजेंडे के केंद्र में रख रहे हैं।
आने वाले दिनों में और तेज होगी सियासी लड़ाई
विशेषज्ञों का कहना है कि विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होगी। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों के आधार पर जनता का विश्वास बनाए रखने की कोशिश करेगा, जबकि विपक्ष इन मुद्दों को सरकार की जवाबदेही से जोड़कर चुनावी माहौल बनाने का प्रयास करेगा। ऐसे में ‘शिक्षा बनाम व्यवस्था’ का यह नैरेटिव आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना रह सकता है।
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