“प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट में कोडीन युक्त कफ सिरप मामले की सुनवाई के दौरान जज से निजी संपर्क की कोशिश का मामला सामने आया। न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने इसे न्यायपालिका के लिए काला दिन बताते हुए खुद को सुनवाई से अलग कर लिया।“
प्रयागराज। कोडीन युक्त कफ सिरप मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। आरोपियों की जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कुछ वादकारियों द्वारा पीठासीन न्यायाधीश तक निजी तौर पर संपर्क स्थापित करने की कथित कोशिश के बाद न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया।
न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने इस घटना को “हाईकोर्ट के इतिहास का काला दिन” बताते हुए कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता।
जज तक निजी पहुंच बनाने के प्रयास पर कोर्ट नाराज
कोडीन युक्त कफ सिरप मामले में मुख्य आरोपी भोला जायसवाल सहित कई आरोपियों ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं।
इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के लिए 30 जुलाई की तारीख तय की गई थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रखा जा सकता था, लेकिन इसके बाद वादकारी पक्षों की ओर से पीठासीन न्यायाधीश तक निजी माध्यम से पहुंच बनाने की कोशिश की गई।
अदालत ने कहा कि इस तरह के प्रयास न्यायपालिका की स्वतंत्रता की जड़ों को कमजोर करते हैं और इससे आम लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा प्रभावित हो सकता है।
“न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए”
न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय केवल किया जाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से दिखाई भी देना चाहिए कि फैसला पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुआ है।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में बाहरी प्रभाव या निजी संपर्क की आशंका पैदा होती है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल न्यायाधीशों का अधिकार नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक की संवैधानिक गारंटी है।
सभी जमानत याचिकाएं दूसरी पीठ को भेजने का आदेश
कड़ी टिप्पणी के बाद हाईकोर्ट ने वर्तमान जमानत याचिका सहित सभी संबंधित याचिकाओं को अपनी पीठ से मुक्त कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि इन मामलों को मुख्य न्यायाधीश से नामांकन प्राप्त कर किसी अन्य उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।
साथ ही स्पष्ट किया गया कि ये मामले दोबारा न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की पीठ के सामने प्रस्तुत नहीं किए जाएंगे।
पहले भी आरोपियों को नहीं मिली राहत
कोडीन युक्त कफ सिरप मामले में आरोपियों ने सबसे पहले प्राथमिकी रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।
हालांकि हाईकोर्ट की अलग-अलग पीठों और लखनऊ बेंच ने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था।
अदालत ने कहा था कि मामले में जांच के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।
इसके बाद आरोपियों ने अग्रिम जमानत याचिकाएं दाखिल कीं, लेकिन उन्हें भी राहत नहीं मिली। इसके बाद गिरफ्तार आरोपियों ने नियमित जमानत के लिए याचिका दाखिल की थी।
कोडीन युक्त कफ सिरप मामला क्या है?
कोडीन युक्त कफ सिरप का इस्तेमाल कई बार दर्द और खांसी की दवा के रूप में किया जाता है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल नशे के लिए भी किया जाता है।
इसी कारण सरकार और जांच एजेंसियां कोडीन युक्त दवाओं की अवैध बिक्री और वितरण पर निगरानी रखती हैं।
इस मामले में जांच एजेंसियां आरोपियों की भूमिका, दवा की आपूर्ति और नेटवर्क की जांच कर रही हैं।
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