दुष्कर्म में पहरा देने या पीड़िता को पकड़ने वाला भी मुख्य आरोपी जितना ही दोषी: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 42 साल पुराने दुष्कर्म मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि दुष्कर्म के दौरान पहरा देने या पीड़िता को पकड़कर मुख्य आरोपी की मदद करने वाला भी IPC की धारा 34 के तहत मुख्य आरोपी जितना ही दोषी होगा। जानिए कोर्ट की पूरी टिप्पणी और फैसले की अहम बातें।

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट के दुष्कर्म मामले में अहम फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति दुष्कर्म के दौरान पहरा देता है, पीड़िता को पकड़कर मुख्य आरोपी की मदद करता है या अपराध को अंजाम देने में सक्रिय सहयोग करता है, तो उसे भी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 (साझा मंशा) के तहत मुख्य आरोपी के बराबर दोषी माना जाएगा।

न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी 42 वर्ष पुराने रामपुर दुष्कर्म मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने सुभाष सिंह और शेर सिंह की आपराधिक अपील खारिज करते हुए उनकी पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी।

हर आरोपी का दुष्कर्म करना जरूरी नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह आवश्यक नहीं है कि हर आरोपी ने स्वयं दुष्कर्म किया हो। यदि किसी व्यक्ति ने साझा मंशा (Common Intention) के तहत अपराध को अंजाम देने में सहयोग किया है, तो वह भी समान रूप से उत्तरदायी होगा।

अदालत ने कहा कि अपराध को आसान बनाने वाला प्रत्येक व्यक्ति कानून की नजर में समान जिम्मेदारी वहन करेगा।

दो सप्ताह में सरेंडर करने का आदेश

हाई कोर्ट ने दोनों दोषियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में समर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया। दोनों फिलहाल जमानत पर हैं। साथ ही ट्रायल कोर्ट को दो महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश भी दिए गए हैं।

क्या था पूरा मामला?

अभियोजन के अनुसार, 14 मार्च 1984 को रामपुर जिले के टांडा थाना क्षेत्र के बदली गांव में दो महिलाएं जंगल में सूखे पत्ते बीनने गई थीं। आरोप है कि वहां पहले से मौजूद पांच लोगों ने उन्हें घेर लिया और गड्ढे में ले जाकर अलग-अलग दुष्कर्म किया।

मामले के अनुसार—

  • एक आरोपी ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया।
  • सुभाष सिंह और शांति ने पीड़िता का मुंह और हाथ पकड़कर मुख्य आरोपी की मदद की।
  • दूसरी महिला के साथ दूसरे आरोपी ने दुष्कर्म किया।
  • शेर सिंह बाहर खड़ा होकर पहरा देता रहा और किसी के आने पर साथियों को सतर्क करता रहा।

शोर सुनकर परिजन मौके पर पहुंचे, जिसके बाद सभी आरोपी फरार हो गए। घटना के दिन ही प्राथमिकी दर्ज कर ली गई थी।

1985 में हुई थी सजा

अपर सत्र न्यायाधीश ने 6 दिसंबर 1985 को मुख्य आरोपियों को दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए तथा सहयोग करने वाले आरोपियों को धारा 376/34 IPC के तहत दोषी मानकर पांच-पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

इसके खिलाफ 1986 में हाई कोर्ट में अपील दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान एक आरोपी शांति की मृत्यु हो जाने के कारण उसके संबंध में अपील समाप्त हो गई, जबकि शेष दो आरोपियों की अपील खारिज कर दी गई।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था में केवल प्रत्यक्ष अपराध करने वाला ही नहीं, बल्कि अपराध को सफल बनाने में सक्रिय सहयोग देने वाला प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से जिम्मेदार होता है। साझा मंशा के आधार पर ऐसे आरोपियों की जवाबदेही तय करना कानून का मूल सिद्धांत है।

“देश-दुनिया से जुड़े राजनीतिक, मनोरंजन और खेल और सामयिक घटनाक्रम की विस्तृत और सटीक जानकारी के लिए ‘राष्ट्रीय प्रस्तावना’ के साथ जुड़े रहें। ताज़ा खबरों, चुनावी बयानबाज़ी और विशेष रिपोर्ट्स के लिए हमारे साथ बने रहें।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button