“उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में ग्लेशियर पिघलने से 77 से अधिक नई झीलें बनी हैं। विशेषज्ञों ने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, बाढ़ और भूस्खलन के खतरे को लेकर चेताया है।“
नैनीताल। नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी और तेजी से पिघलते ग्लेशियर अब उत्तराखंड के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत दे रहे हैं। पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से 77 से अधिक नई झीलें बन चुकी हैं। इनमें बड़ी मात्रा में मलबा जमा है। विशेषज्ञों के अनुसार भारी बारिश, भूस्खलन या किसी अन्य भू-गतिविधि के कारण यदि इन झीलों की प्राकृतिक दीवार टूटी तो अचानक पानी का तेज बहाव नीचे के इलाकों में पहुंच सकता है। इससे बाढ़, भूस्खलन और बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि का खतरा है।
32 साल में गोरी गंगा बेसिन का करीब 20 प्रतिशत बर्फीला क्षेत्र खत्म
कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर नैनीताल के भूगोल विभाग के प्रो. देवेंद्र परिहार ने जीआइएस तकनीक की मदद से वर्ष 1990 से 2022 तक गोरी गंगा क्षेत्र का अध्ययन किया। अध्ययन में सामने आया कि वर्ष 1990 में गोरी गंगा बेसिन का करीब 30.9 प्रतिशत क्षेत्र बर्फ से ढका था। वर्ष 2022 तक यह घटकर महज 10.99 प्रतिशत रह गया।
यानी 32 वर्षों के दौरान इस क्षेत्र के बर्फीले हिस्से में करीब 20 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने की मौजूदा रफ्तार बनी रही तो आने वाले वर्षों में गोरी गंगा बेसिन के लिए गंभीर जलवायु और आपदा संबंधी संकट पैदा हो सकता है।
पिथौरागढ़ में नई बनी झीलों से बढ़ा खतरा
भारत-नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले में गोरी गंगा और काली नदी के आसपास के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर दिखाई दे रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई स्थानों पर पानी जमा होकर नई झीलों का निर्माण हो रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन झीलों में मलबा और पानी लगातार जमा हो रहा है। यदि किसी झील की प्राकृतिक रोकथाम करने वाली संरचना कमजोर हुई और वह टूट गई तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है। ऐसी स्थिति में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी आपदा पैदा हो सकती है।
इसका सबसे अधिक असर नदी घाटियों में बसे गांवों, कृषि भूमि, सड़कों, पुलों और पनबिजली परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग के साथ मानवीय गतिविधियां भी चिंता का कारण
शोध के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। इसके साथ ही अनियोजित सड़क निर्माण और मानवीय गतिविधियों ने भी संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों पर दबाव बढ़ाया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय दुनिया की सबसे युवा और नाजुक पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। इसे धरती का महत्वपूर्ण ‘वाटर टावर’ भी माना जाता है। यहां बर्फ और ग्लेशियरों में जमा पानी धीरे-धीरे नदियों और जलस्रोतों को पानी उपलब्ध कराता है। ऐसे में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना भविष्य में जल संकट के साथ-साथ बाढ़ और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ा सकता है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत
प्रो. देवेंद्र परिहार के अनुसार ग्लेशियरों में लगातार हो रही बर्फ की कमी और नई झीलों का निर्माण भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है। संवेदनशील झीलों की लगातार निगरानी करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किए जाने की आवश्यकता है, जहां ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा अधिक है।
उन्होंने नदी किनारे अनियोजित निर्माण और मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण की जरूरत भी बताई। उनके मुताबिक गोरी गंगा क्षेत्र में बेतरतीब विकास के कारण कई गांव बाढ़ और भूस्खलन के जोखिम में आ गए हैं।
15 गांव अचानक बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं
प्रो. परिहार के अनुसार गोरी गंगा क्षेत्र में करीब 15 गांव अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील हैं। वहीं बेतरतीब सड़क निर्माण और अनियोजित विकास के चलते सक्रिय भूस्खलन वाले 91 से अधिक गांव सामने आए हैं। इसके अलावा बार-बार आपदा की घटनाओं के कारण 25 से अधिक गांवों को जोखिम वाले गांवों की श्रेणी में रखा गया है।
ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय भूगर्भीय स्थिति और प्राकृतिक आपदा के जोखिम को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
उत्तराखंड में पहले भी मचा है प्राकृतिक आपदाओं का कहर
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। वर्ष 1998 में मालपा और ऊखीमठ, 2009 में नाचनी, 2010 में मुनस्यारी और कपकोट, 2012 में रुद्रप्रयाग और अन्य घटनाओं में बड़े पैमाने पर जन-धन की क्षति हुई।
वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा तो पूरे देश के लिए भयावह त्रासदी बन गई थी। मंदाकिनी, भागीरथी और अलकनंदा नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी तबाही हुई थी। विशेषज्ञों के अनुसार उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम लगातार बना हुआ है।
बढ़ता तापमान उत्तराखंड के लिए भी खतरे की घंटी
कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जलवायु परिवर्तन पर लंबे समय से अध्ययन कर रहे प्रो. पीसी तिवारी के अनुसार हिमालय में तापमान बढ़ने से उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर भी असर पड़ेगा।
उनका कहना है कि बर्फ पिघलने के बाद सामने आने वाली गहरी चट्टानें सूर्य की गर्मी को अधिक सोखती हैं, जिससे गर्मी का प्रभाव और बढ़ सकता है। ग्लेशियरों के कमजोर होने से हिमस्खलन और झीलों के बनने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
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