चुनाव आयोग विवाद: सुप्रीम कोर्ट में याचिका, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोपों पर अगले हफ्ते सुनवाई

“सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सहमति दी है। याचिका में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और आयोग के फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।“

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए जल्द सुनवाई की मांग की थी।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी या जानकारी के बिना लिए गए। याचिकाकर्ता ने इसे निर्वाचन आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से जोड़ते हुए अदालत से इस मामले की जांच करने की मांग की है।

क्या है याचिका में मुख्य आरोप?

याचिका राकेश कुमार सिंह की ओर से दाखिल की गई है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने को कहा गया है कि उन्होंने किस अधिकार के तहत ऐसे कार्य किए, जिन्हें याचिकाकर्ता के अनुसार पूरे आयोग के सामूहिक निर्णय के रूप में लिया जाना चाहिए था।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा गया है कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके अधिकारों का इस्तेमाल संस्थागत प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि आयोग के भीतर सत्ता के केंद्रीकरण की स्थिति बनी, बैठकों के एजेंडे और कार्यवृत्त से जुड़े मामलों में देरी हुई तथा मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं में बदलाव किए गए।

SIR प्रक्रिया को लेकर भी उठाए गए सवाल

याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि क्या SIR से संबंधित निर्णय वास्तव में पूरे चुनाव आयोग द्वारा सामूहिक रूप से लिए गए थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत के समक्ष कहा कि यदि आयोग बहुसदस्यीय संस्था है तो उसके फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर होने चाहिए। उनका तर्क है कि यदि किसी प्रक्रिया से संबंधित निर्णय आयोग का सामूहिक निर्णय नहीं था, तो उस निर्णय के आधार पर आगे की कानूनी कार्यवाही पर भी सवाल उठ सकता है।

2023 के कानून का दिया गया हवाला

याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, कानून में आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से संचालित करने का प्रावधान है। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो तो मामले का निर्णय बहुमत की राय के आधार पर किया जाना चाहिए।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का मुद्दा

यह याचिका ऐसे समय आई है जब चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर सार्वजनिक चर्चा तेज हुई है। हाल की रिपोर्टों में चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई थी।

हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से SIR से जुड़े फैसलों को लेकर यह कहा गया है कि संबंधित निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी 28 सितंबर को आयोग के इस स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कहा था कि तीनों चुनाव आयुक्तों ने SIR से जुड़े फैसलों पर सहमति जताई थी।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अब प्रमुख सवाल यह होगा कि याचिका में लगाए गए आरोपों और आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े कानूनी प्रावधानों की न्यायिक जांच किस सीमा तक की जाती है।

अगले सप्ताह होगी मामले पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों, निर्वाचन आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर दलीलें रखी जा सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर 29 सितंबर 2026 की लिस्टिंग और आगामी तारीखों की कॉज-लिस्ट उपलब्ध है।

फिलहाल अदालत ने याचिका में लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। मामले की अगली सुनवाई में ही यह स्पष्ट होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर किस तरह आगे बढ़ता है।

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