“नदवतुल उलमा के मोहतमिम मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी का निधन हो गया। उन्होंने इस्लामी शिक्षा, अरबी भाषा-साहित्य, पत्रकारिता और धार्मिक संस्थानों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले थे।“
लखनऊ। दारुल उलूम नदवतुल उलमा और इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर, प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान, अरबी भाषा एवं साहित्य के विशेषज्ञ, लेखक और पत्रकार मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी के निधन से शैक्षिक और धार्मिक जगत में शोक की लहर है। उन्होंने अपना लंबा जीवन इस्लामी शिक्षा, अरबी भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और धार्मिक संस्थानों की सेवा में समर्पित किया।
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी का नदवतुल उलमा से संबंध कई दशकों तक रहा। उन्होंने इसी संस्थान में छात्र के रूप में शिक्षा प्राप्त की और बाद में शिक्षक, लेखक, पत्रकार, अरबी विभाग के प्रमुख तथा मोहतमिम जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
मऊ में हुआ था जन्म, 1952 में पहुंचे नदवा
मौलाना सईदुर्रहमान नदवी का जन्म वर्ष 1934 में मऊ में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च धार्मिक एवं भाषायी शिक्षा के लिए वर्ष 1952 में दारुल उलूम नदवतुल उलमा, लखनऊ का रुख किया।
नदवा में उन्होंने अरबी भाषा और साहित्य के साथ धार्मिक शिक्षा हासिल की। उनके प्रमुख शिक्षकों में मौलाना शाह मोहम्मद हलीम अता सलोनवी, मौलाना अबुलफजल, अब्दुल हफीज बलियावी, डॉ. अब्दुल्लाह अब्बास नदवी और मौलाना सैयद मोहम्मद राबे हसनी नदवी जैसे विद्वान शामिल रहे।
छात्र से मोहतमिम तक का सफर
नदवतुल उलमा में शिक्षा पूरी करने के बाद मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी इसी संस्थान में शिक्षक के रूप में जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने शिक्षा, लेखन और प्रशासन के क्षेत्र में लगातार जिम्मेदारियां संभालीं।
उन्होंने अरबी विभाग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ संस्थान की विभिन्न शैक्षिक एवं संपादकीय गतिविधियों में योगदान दिया। वर्ष 1993 से 1999 तक वह अरबी विभाग के अध्यक्ष रहे। वर्ष 2000 में उन्हें दारुल उलूम नदवतुल उलमा का मोहतमिम नियुक्त किया गया।
मोहतमिम के रूप में उन्होंने संस्थान की प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी शैक्षिक और पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
अरबी पत्रकारिता में भी बनाया महत्वपूर्ण स्थान
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी के व्यक्तित्व का एक अहम पक्ष उनकी अरबी पत्रकारिता थी। वह नदवतुल उलमा की मासिक पत्रिका ‘अल-बहसुल इस्लामी’ से लंबे समय तक जुड़े रहे। वर्ष 1979 में उन्हें इस पत्रिका के मुख्य संपादक की जिम्मेदारी सौंपी गई।
उनके संपादन और लेखन के माध्यम से भारत के धार्मिक, शैक्षिक और वैचारिक विमर्श को अरबी भाषा के जरिए व्यापक स्तर तक पहुंचाने का प्रयास हुआ। उन्होंने अरबी में धार्मिक, शैक्षिक और समकालीन विषयों पर नियमित रूप से लेखन किया।
उनकी अरबी पत्रकारिता पर शोध कार्य भी हुआ। उनकी सेवाओं को भारत में अरबी पत्रकारिता और अरबी साहित्य के विकास के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से भी रहा जुड़ाव
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी का नाम ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के संस्थापक सदस्यों में भी लिया जाता है। बोर्ड से जुड़े रहते हुए उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ, शरीयत, धार्मिक पहचान और समुदाय से जुड़े विभिन्न विषयों पर शैक्षिक विमर्श में भाग लिया।
मई 2026 में नदवतुल उलमा में आयोजित तफहीम-ए-शरीयत कार्यशाला के दौरान उनकी लंबे समय की शैक्षिक, साहित्यिक, धार्मिक और पत्रकारिता सेवाओं को सम्मान देते हुए उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया गया था।
अरबी और उर्दू में किया साहित्यिक कार्य
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी ने अरबी और उर्दू दोनों भाषाओं में लेखन किया। उनकी चर्चित रचनाओं में ‘इस्लाम और पश्चिम’ शामिल है। इसके अलावा उनके अनेक लेख और शैक्षिक सामग्री ‘अल-बहसुल इस्लामी’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही।
उनका लेखन धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं था। उन्होंने शिक्षा, भाषा, साहित्य और समकालीन वैचारिक मुद्दों पर भी अपनी कलम चलाई।
कई सम्मान से नवाजे गए
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी की शैक्षिक और साहित्यिक सेवाओं को विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित किया। वर्ष 2013 में इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया।
वर्ष 2019 में लखनऊ के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी, फारसी विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें मानद डी.लिट की उपाधि प्रदान की गई। मई 2026 में जामिया हिदाया, जयपुर की ओर से भी उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
इन सम्मानों के अवसर पर उनके सादगीपूर्ण व्यक्तित्व, विनम्र व्यवहार, अनुशासन, समय की पाबंदी और संस्थान के प्रति समर्पण को विशेष रूप से याद किया गया।
नदवा की परंपरा को आगे बढ़ाया
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी नदवी का जीवन नदवतुल उलमा की उस शैक्षिक परंपरा का उदाहरण रहा, जिसमें धार्मिक शिक्षा के साथ अरबी भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और समकालीन विचारों को भी महत्व दिया जाता है।
एक छात्र के रूप में नदवा पहुंचने वाले मौलाना ने इसी संस्थान में शिक्षक के रूप में लंबी सेवाएं दीं। उन्होंने अरबी विभाग का नेतृत्व किया, पत्रकारिता और संपादन की जिम्मेदारी संभाली और अंततः मोहतमिम के रूप में संस्थान का प्रशासनिक एवं शैक्षिक नेतृत्व किया।
उनके निधन को धार्मिक, शैक्षिक, साहित्यिक और पत्रकारिता जगत के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है। उनके योगदान को नदवतुल उलमा और अरबी शिक्षा-जगत में लंबे समय तक याद किया जाएगा।
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