28 साल बाद पत्नी की कानूनी लड़ाई लाई रंग, लापता जवान देवेंद्र प्रसाद आर्या को मिला न्याय; अब मिलेगी पारिवारिक पेंशन

“यूपी के लापता सेना के जवान देवेंद्र प्रसाद आर्या की पत्नी जानकी देवी ने 28 साल की कानूनी लड़ाई के बाद राहत पाई। सशस्त्र बल अधिकरण की लखनऊ पीठ ने चार महीने में पारिवारिक पेंशन जारी करने का आदेश दिया।“

लखनऊ। पति के लापता होने का दर्द, उस पर भगोड़ा होने का आरोप और परिवार के हक की लंबी लड़ाई। उत्तराखंड के बागेश्वर की जानकी देवी ने करीब 28 साल तक इन मुश्किलों का सामना किया। उनके पति सिपाही देवेंद्र प्रसाद आर्या सेना में तैनात थे और 23 जून 1998 को ड्यूटी के दौरान लापता हो गए थे। बाद में सेना ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसके बाद पत्नी ने पति को मृत मानने और पारिवारिक पेंशन पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार सशस्त्र बल अधिकरण की लखनऊ पीठ ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए रक्षा मंत्रालय को चार महीने के भीतर सामान्य पारिवारिक पेंशन जारी करने का आदेश दिया।

1988 में सेना में भर्ती हुए थे देवेंद्र प्रसाद आर्या

देवेंद्र प्रसाद आर्या उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कसौनी क्षेत्र के नाकुरी गांव के निवासी थे। वह 17 मई 1988 को कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। सेना में सेवा के दौरान उनकी तैनाती 57 माउंटेन डिवीजन कैंप की यूनिट में थी।

23 जून 1998 को वह यूनिट लाइन से अचानक लापता हो गए। उनके लापता होने के बाद सेना की ओर से उनकी तलाश और मामले की जांच की प्रक्रिया शुरू की गई। हालांकि, उनका कोई पता नहीं चल सका। परिवार के लिए यह स्थिति बेहद कठिन थी, क्योंकि एक तरफ पति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और दूसरी तरफ उनके सेवा संबंधी रिकॉर्ड में भी प्रतिकूल स्थिति बन गई।

जांच के बाद भगोड़ा घोषित कर सेवा से किया गया बर्खास्त

देवेंद्र प्रसाद आर्या का पता लगाने के लिए सेना ने 10 जनवरी 2001 को कर्नल रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता में कोर्ट ऑफ इंक्वायरी गठित की। जांच के तहत सेना के अधिकारियों ने उनके घर और पुलिस स्टेशन तक जाकर जानकारी जुटाई।

इसके बावजूद जवान का कोई सुराग नहीं मिला। इसके बाद आर्मी एक्ट, 1950 के तहत उन्हें भगोड़ा घोषित करते हुए सेवा से बर्खास्त करने का आदेश 20 अक्टूबर 2008 को जारी किया गया।

इस फैसले के बाद उनकी पत्नी जानकी देवी के सामने मुश्किलें और बढ़ गईं। पति के लापता होने की स्थिति में परिवार को आर्थिक सुरक्षा दिलाने के लिए उन्हें सरकारी कार्यालयों और कानूनी संस्थाओं के चक्कर लगाने पड़े।

आरटीआई से लेकर सिविल कोर्ट तक पहुंचीं जानकी देवी

जानकी देवी ने अपने पति के मामले में जानकारी हासिल करने और पेंशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए 17 अगस्त 2012 को कुमाऊं रेजिमेंट के रिकॉर्ड ऑफिस में सूचना का अधिकार यानी आरटीआई आवेदन दिया। उन्होंने पति को लापता मानते हुए मृत घोषित करने और पारिवारिक पेंशन स्वीकृत करने के लिए की गई कार्रवाई का ब्योरा मांगा।

इसके बाद उन्होंने बागेश्वर के सिविल जज के समक्ष वाद संख्या 04/2019 दायर किया। अदालत ने 20 मार्च 2021 को उनके पक्ष में निर्णय दिया। इस फैसले के बावजूद पारिवारिक पेंशन जारी करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

जानकी देवी ने लंबे समय तक पत्राचार किया, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सशस्त्र बल अधिकरण की लखनऊ पीठ का दरवाजा खटखटाया।

सशस्त्र बल अधिकरण की लखनऊ पीठ ने दिया राहत का आदेश

मामले की सुनवाई सशस्त्र बल अधिकरण की लखनऊ पीठ में हुई। पीठ में न्यायिक सदस्य सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुरेश कुमार गुप्ता और प्रशासनिक सदस्य सेवानिवृत्त वाइस एडमिरल अतुल कुमार जैन शामिल थे।

अधिकरण ने मामले में जानकी देवी की परिस्थितियों और पहले से पारित सिविल कोर्ट के आदेश पर विचार किया। आदेश में उल्लेख किया गया कि याचिकाकर्ता निरक्षर हैं और दूरस्थ क्षेत्र में रहती हैं। उनके पक्ष में सिविल कोर्ट का फैसला भी एक महत्वपूर्ण आधार है।

अधिकरण ने रिकॉर्ड ऑफिस की ओर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने की बात पर भी गौर किया। इसके बाद रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया गया कि सिविल कोर्ट के आदेश के आधार पर देवेंद्र प्रसाद आर्या को मृत मानते हुए उनकी पत्नी जानकी देवी के पक्ष में सामान्य पारिवारिक पेंशन चार महीने के भीतर जारी की जाए।

28 साल के संघर्ष के बाद मिला परिवार को आर्थिक अधिकार

जानकी देवी की यह कानूनी लड़ाई केवल पेंशन हासिल करने तक सीमित नहीं थी। उनके पति के लापता होने के बाद उन्हें लंबे समय तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही पति को भगोड़ा घोषित किए जाने के कारण उनके परिवार के पेंशन संबंधी दावे पर भी असर पड़ा।

लगातार प्रयासों, आरटीआई आवेदन, सिविल कोर्ट में मुकदमे और सशस्त्र बल अधिकरण में अपील के बाद अब उन्हें राहत मिली है। अधिकरण के आदेश से उनके पारिवारिक पेंशन के दावे को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है।

हालांकि, पेंशन की वास्तविक शुरुआत और भुगतान की स्थिति रक्षा मंत्रालय की ओर से आदेश के अनुपालन के बाद ही स्पष्ट होगी।

प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी पर भी उठे सवाल

यह मामला उन परिस्थितियों को भी सामने लाता है, जिनमें किसी कर्मचारी या सैनिक के लंबे समय तक लापता रहने पर उसके परिवार को कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। जानकी देवी को सिविल कोर्ट से राहत मिलने के बाद भी पेंशन के लिए अधिकरण जाना पड़ा।

अधिकरण के आदेश के बाद अब रक्षा मंत्रालय को निर्धारित चार महीने की अवधि में आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। यह फैसला जानकी देवी के लिए राहत के साथ-साथ लंबे समय से लंबित पेंशन संबंधी दावे के निस्तारण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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