“कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने की अटकलें तेज हो गई हैं। सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा के बीच कांग्रेस की नई रणनीति सामने आ रही है। जानिए कांग्रेस का गेमप्लान, BJP-JDS गठबंधन की चुनौती और 2028 चुनाव का पूरा राजनीतिक समीकरण।“
बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। गुरुवार को दोनों नेताओं की प्रस्तावित नाश्ते पर बैठक ने सत्ता परिवर्तन की चर्चाओं को और हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि कांग्रेस हाईकमान जल्द ही नेतृत्व परिवर्तन का फैसला ले सकता है और डीके शिवकुमार को राज्य की कमान सौंपी जा सकती है।
हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने मुख्यमंत्री बदलने की अटकलों को खारिज किया है, लेकिन पार्टी के भीतर जिस तरह की हलचल है, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस कर्नाटक में नया राजनीतिक प्रयोग करने की तैयारी में है। पार्टी आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बैठाना चाहती है।
सत्ता और संगठन के बीच संतुलन की कवायद
कर्नाटक कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझ रही है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जहां खुद को जनाधार वाला अनुभवी नेता साबित करते रहे हैं, वहीं डीके शिवकुमार को संगठन का मजबूत चेहरा माना जाता है। चुनावी रणनीति, संसाधन प्रबंधन और विधायकों को एकजुट रखने की उनकी क्षमता ने उन्हें पार्टी नेतृत्व का भरोसेमंद नेता बनाया है।
2023 विधानसभा चुनाव के बाद भी दोनों नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान सामने आई थी। उस समय ‘ढाई-ढाई साल’ के कथित फॉर्मूले की चर्चा भी चली थी, जिसके तहत पहले सिद्धारमैया और बाद में डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाना था। हालांकि पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर कभी इसकी पुष्टि नहीं की।
अब जब राज्य सरकार अपने कार्यकाल के मध्य में पहुंच चुकी है, तब एक बार फिर सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री आरवी देशपांडे के बयान ने इन अटकलों को और मजबूत कर दिया है। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अगले 24 घंटे में इस्तीफा दे सकते हैं।
कांग्रेस की बदली हुई रणनीति का संकेत
कर्नाटक की यह हलचल केवल राज्य तक सीमित नहीं मानी जा रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब अपनी राष्ट्रीय रणनीति में बड़ा बदलाव कर रही है। पार्टी उन राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जहां मजबूत स्थानीय चेहरों की जरूरत महसूस की जा रही है।
बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस कई महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव हार चुकी है। इससे पार्टी के भीतर यह सोच मजबूत हुई है कि केवल केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते। अब कांग्रेस स्थानीय समीकरण, जातीय संतुलन और क्षेत्रीय नेतृत्व को अधिक महत्व देने लगी है।
यही वजह है कि पार्टी उन राज्यों में गठबंधन की राजनीति को प्राथमिकता दे रही है, जहां उसका जनाधार कमजोर है। वहीं जिन राज्यों में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है, वहां संगठन को और धार देने के लिए नए चेहरे सामने लाए जा रहे हैं।
क्या बीजेपी मॉडल पर चल रही कांग्रेस?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस अब भारतीय जनता पार्टी की कई सफल रणनीतियों को अपनाने की कोशिश कर रही है। बीजेपी ने पिछले वर्षों में अलग-अलग राज्यों में स्थानीय नेताओं को आगे कर अपनी स्थिति मजबूत की। असम में हिमंता बिस्वा सरमा, पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी और बिहार में सम्राट चौधरी जैसे नेताओं को आगे बढ़ाकर बीजेपी ने संगठन का विस्तार किया।
इसी तरह कांग्रेस भी अब राज्यवार रणनीति बना रही है। पार्टी क्षेत्रीय नेताओं को अधिक अधिकार देने, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने और सामाजिक समीकरणों के आधार पर चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटी है।
कांग्रेस अब ओबीसी, दलित, आदिवासी और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति को नए तरीके से साधने की कोशिश कर रही है। “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी भागीदारी” जैसे नारों के जरिए पार्टी सामाजिक न्याय के मुद्दे को मजबूत करना चाहती है। लोकसभा चुनाव 2024 में कुछ राज्यों में मिले सकारात्मक संकेतों के बाद कांग्रेस इस रणनीति को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रही है।
डीके शिवकुमार क्यों अहम हैं?
डीके शिवकुमार को कर्नाटक कांग्रेस का संकटमोचक माना जाता है। पार्टी के भीतर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। वे वोक्कालिगा समुदाय के प्रभावशाली नेता हैं और दक्षिण कर्नाटक में उनकी अच्छी राजनीतिक पकड़ है। कांग्रेस मानती है कि अगर 2028 में बीजेपी-जेडीएस गठबंधन को चुनौती देनी है, तो मजबूत संगठनात्मक नेतृत्व जरूरी होगा।
साथ ही, डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश भी कर सकती है। इससे पार्टी को दक्षिण कर्नाटक में अतिरिक्त राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
आने वाले चुनावों पर कांग्रेस की नजर
कांग्रेस की नजर केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों में भी पार्टी नई रणनीति के साथ उतरने की तैयारी कर रही है। गठबंधन की राजनीति, सामाजिक समीकरण और स्थानीय नेतृत्व को केंद्र में रखकर पार्टी बीजेपी के मुकाबले नई जमीन तैयार करना चाहती है।
कर्नाटक में अगर नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो यह केवल मुख्यमंत्री बदलने का मामला नहीं होगा, बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जाएगा। अब देखना यह होगा कि पार्टी का यह नया प्रयोग उसे राजनीतिक फायदा दिलाता है या फिर आंतरिक खींचतान उसकी मुश्किलें और बढ़ा देती है।
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