दागी मंत्रियों को पद से हटाने वाले विधेयक पर JPC 17 जुलाई तक सौंपेगी रिपोर्ट

130वें संविधान संशोधन विधेयक पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) 17 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। प्रस्तावित कानून में गंभीर अपराधों के आरोपी मंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान किया गया है।

नई दिल्ली। राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और संवैधानिक नैतिकता को मजबूत करने के उद्देश्य से लाए गए संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) अपनी रिपोर्ट 17 जुलाई तक लोकसभा अध्यक्ष को सौंप सकती है। यह रिपोर्ट संसद के आगामी मानसून सत्र से ठीक पहले पेश की जाएगी।

संयुक्त संसदीय समिति की अध्यक्ष सांसद अपराजिता सारंगी ने बताया कि समिति विभिन्न वर्गों और संस्थानों से सुझाव लेने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार कर रही है। उनके अनुसार, इस पहल का उद्देश्य राजनीति में आपराधिक तत्वों की भागीदारी को कम करना और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना है।

42 संस्थानों से लिए गए सुझाव

सूत्रों के अनुसार, समिति ने अब तक देशभर के 42 संस्थानों, लॉ कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और गैर सरकारी संगठनों से सुझाव प्राप्त किए हैं। इसके अलावा कई राज्य सरकारों से भी लिखित सुझाव लिए गए हैं।

समिति के सदस्यों ने कई राज्यों का दौरा कर विभिन्न पक्षों की राय जानी है, जबकि कुछ राज्यों ने लिखित रूप में अपनी प्रतिक्रिया भेजी है।

क्या है 130वें संविधान संशोधन विधेयक का प्रस्ताव?

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार यदि कोई मंत्री ऐसे अपराध में आरोपी है जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है या वह 30 दिनों से अधिक समय तक जेल में रहता है, तो उसे मंत्री पद से हटाया जा सकता है।

विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री की सलाह पर ऐसे मंत्री को पद से हटा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में स्वतः पदमुक्ति का प्रावधान भी शामिल किया गया है।

विपक्ष ने पहले किया था विरोध

नवंबर 2025 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा इस विधेयक को संसद में पेश किए जाने के दौरान विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था। इसके बाद दिसंबर 2025 में 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया।

हालांकि विपक्ष के कुछ दलों ने समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया था, जबकि कुछ गैर-एनडीए सदस्यों ने समिति की बैठकों में हिस्सा लिया।

मानसून सत्र पर टिकी निगाहें

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार आगामी मानसून सत्र में इस विधेयक को सदन में पेश करेगी या नहीं। संवैधानिक संशोधन होने के कारण इस विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो भारतीय राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है।

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