RSS के 100 साल: वह स्वयंसेवक जिसने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में मौत को मात दी और खड़ा किया वनवासी कल्याण आश्रम

RSS के 100 सालों की ऐतिहासिक श्रृंखला में आज पेश है रमाकांत केशव देशपांडे उर्फ बालासाहेब देशपांडे की कहानी, जिन्हें ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान ब्रिटिश झंडा उतारने पर फांसी की सजा मिली थी। बाद में उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की और आदिवासी समाज के विकास में अपना जीवन समर्पित कर दिया। पढ़ें उनका प्रेरक सफर जिसने RSS के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जो संगठन की विचारधारा और उसके स्वयंसेवकों के अविराम त्याग को दिखाते हैं। इन्हीं अद्भुत प्रसंगों में से एक है रमाकांत केशव देशपांडे, जिन्हें दुनिया बालासाहेब देशपांडे के नाम से जानती है।

ब्रिटिश झंडा उतारने पर मिली थी फांसी

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब कांग्रेस के बड़े नेता जेल में थे और आंदोलन उग्र रूप ले चुका था, उसी समय रामटेक तहसील में एक घटना ने अंग्रेजों की सत्ता हिला दी। RSS के उस समय के नगर कार्यवाह देशपांडे ने तहसील कार्यालय पर फहरा रहे ब्रिटिश यूनियन जैक को उतार फेंका। यह अंग्रेजी सरकार के लिए सीधी चुनौती थी।

अंग्रेज जज ने तहसीलदार और गवाहों के आधार पर उन्हें फांसी की सजा सुना दी। बाद में गवाहों ने बयान बदल दिए और ब्रिटिश कानून की प्रक्रिया के चलते सजा रद्द करनी पड़ी।

देशपांडे मौत के मुंह से बचकर निकल आए—लेकिन उनकी लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई।

आदिवासी समाज की सेवा का निर्णय

1946 में मध्य प्रांत (आज का मध्यप्रदेश) के मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ला को जसपुर में ईसाई मिशनरियों के खिलाफ बड़े विरोध का सामना करना पड़ा। जांच में पता चला कि आदिवासी समाज राष्ट्रवादी संगठनों से दूर हो गया था।

यही वह क्षण था जब सीनियर गांधीवादी ठक्कर बापा ने सुझाव दिया कि यहां राष्ट्रवादी और सामाजिक संगठन की आवश्यकता है। इस मिशन के लिए चुना गया—रमाकांत देशपांडे को।

1948 में देशपांडे अपनी पत्नी के साथ जसपुर पहुँचे और आदिवासी विकास का महाअभियान शुरू किया। उन्होंने 8 से बढ़ाकर 100 से ज्यादा सरकारी-मान्यता प्राप्त स्कूल आदिवासी क्षेत्रों में खड़े कर दिए।

1952 में ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ की स्थापना

जसपुर के राजा विद्याभूषण सिंह जूदेव ने अपने महल के कमरे और अपनी आमदनी का 10% इस मिशन को समर्पित कर दिया। 26 दिसंबर 1952 को—अपने जन्मदिन पर—देशपांडे ने वनवासी कल्याण आश्रम की नींव रखी।

आज यह आश्रम पूरे देश में आदिवासी शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, संस्कृति और सामाजिक उत्थान का सबसे बड़ा राष्ट्रीय नेटवर्क बन चुका है।

इमरजेंसी में 19 महीने जेल

अंग्रेजों की फांसी से तो बच गए, पर 1975 की इमरजेंसी में उन्हें 19 महीने जेल में रखा गया।
सरकार ने उनकी जमीन जब्त की, छात्रावास बंद कराए, कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया—लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा।

‘समाज शिल्पी’ की उपाधि

RSS के सहयोगी संगठनों और आदिवासी समाज ने उन्हें “समाज शिल्पी” कहा—एक ऐसी उपाधि जो उनके जीवन की तपस्या को परिभाषित करती है।

उनकी अंतिम इच्छा थी—
“मेरे बाद संगठन की कमान आदिवासी युवा संभाले।”
और ऐसा ही हुआ। 1993 में जगते राम उरांव को नेतृत्व सौंपा गया।

बालासाहेब देशपांडे की कहानी यह साबित करती है कि एक व्यक्ति इतिहास बदल सकता है—अगर इरादा सिर्फ संघर्ष नहीं, सेवा भी हो।

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