“बरेली के IVRI के वैज्ञानिकों ने घी की खुरचन से उत्तराखंड की बाल मिठाई का विकल्प तैयार कर पेटेंट कराया है। यह तकनीक डेयरी संचालकों की आय बढ़ाएगी।“
बरेली । उत्तर प्रदेश में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में एक अहम पहल करते हुए Indian Veterinary Research Institute के वैज्ञानिकों ने घी बनाने के बाद बचने वाली खुरचन (माइयर) से प्रसिद्ध Bal Mithai का विकल्प तैयार किया है। इस नवाचार का पेटेंट भी करा लिया गया है।
संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, आमतौर पर घी की खुरचन को या तो फेंक दिया जाता है या पशुओं के चारे में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन अब इसी अपशिष्ट को उपयोग में लाकर पौष्टिक और स्वादिष्ट मिठाई तैयार की जा सकेगी।
ऐसे तैयार होगी नई बाल मिठाई
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस उत्पाद में 60 प्रतिशत घी की खुरचन और 40 प्रतिशत खोया (खोवा) का उपयोग किया जाता है। इसमें स्वादानुसार चीनी मिलाकर इसे तैयार किया जाता है, जिसका स्वाद उत्तराखंड की पारंपरिक बाल मिठाई जैसा ही होता है।
खुरचन को पहले मशीन से सुखाकर पाउडर बनाया जाता है, फिर इसे खोये के साथ मिलाकर प्रोसेस किया जाता है। तैयार उत्पाद को डिब्बाबंद पाउडर के रूप में भी विकसित किया गया है, जिसे 4-5 महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
डेयरी सेक्टर को मिलेगा फायदा
इस तकनीक के जरिए डेयरी संचालकों को अतिरिक्त आय का नया स्रोत मिलेगा। अब तक बाल मिठाई पूरी तरह खोया से बनती थी, लेकिन इस तकनीक से खोया की खपत घटकर 40 प्रतिशत रह जाएगी।
तकनीक का होगा व्यावसायीकरण
संस्थान ने इस तकनीक का पेटेंट करा लिया है और अब इसे कंपनियों को ट्रांसफर किया जाएगा। इसके बाद बाजार में डिब्बाबंद पाउडर के रूप में यह उत्पाद उपलब्ध होगा, जिसमें पानी मिलाकर कुछ ही मिनटों में बाल मिठाई तैयार की जा सकेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नवाचार न केवल खाद्य अपशिष्ट को कम करेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और डेयरी उद्योग को भी मजबूती देगा।
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