लखीमपुर खीरी का ‘जय राम जी बाजार’ बना मिसाल, महिलाओं के मैनेजमेंट से चमकी किस्मत

महिलाओं की अगुवाई में बदली गांव की तस्वीर, मनरेगा से विकसित बाजार बना ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता का मॉडल

लखीमपुर खीरी के सरसवां गांव का हाट बाजार अब महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास की नई मिसाल बन गया है। कभी कीचड़ और जलभराव से जूझने वाला यह बाजार आज 160 दुकानों, सोलर लाइट और आधुनिक सुविधाओं से लैस है।

लखीमपुर खीरी। कभी कीचड़, जलभराव और बदहाल व्यवस्थाओं के लिए पहचान रखने वाला धौरहरा विकासखंड के सरसवां गांव का हाट बाजार अब ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की नई पहचान बन गया है। जिस बाजार में बरसात के दिनों में दुकानदारों को कीचड़ के बीच दुकानें लगानी पड़ती थीं, आज वहीं अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस व्यवस्थित बाजार खड़ा है। यह हाट अब न केवल व्यापार का केंद्र बना है बल्कि ग्रामीणों की आय और रोजगार का मजबूत आधार भी बन चुका है।

मनरेगा के तहत विकसित इस ग्रामीण हाट बाजार को लोग अब “जय राम जी बाजार” के नाम से भी जानने लगे हैं। तराई क्षेत्र में यह बाजार ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सफल मॉडल के रूप में उभर रहा है।

कीचड़ और जलभराव से आधुनिक सुविधाओं तक का सफर

एक समय ऐसा था जब बारिश के दौरान बाजार पूरी तरह पानी से भर जाता था। दुकानदारों और ग्राहकों दोनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।

बाजार में पक्के चबूतरे, सोलर लाइट, पेयजल व्यवस्था, शौचालय, सीसीटीवी कैमरे और व्यवस्थित दुकानें बनाई गई हैं। यहां करीब 160 दुकानें नियमित रूप से संचालित हो रही हैं। दुकानदारों से जमीन पर दुकान लगाने के लिए 10 रुपये और चबूतरे पर दुकान लगाने के लिए 20 रुपये शुल्क लिया जाता है।

महिलाओं ने संभाली बाजार की कमान

इस बाजार की सबसे बड़ी ताकत यहां कार्यरत स्वयं सहायता समूह की महिलाएं हैं। पांच स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अपने उत्पाद तैयार कर बाजार में बेच रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।

समूह सखी अमरिशा देवी बताती हैं कि उन्होंने घर पर कोल्हू लगाकर सरसों और लाही का शुद्ध तेल तैयार करना शुरू किया। उनका कहना है कि पहले महिलाएं घरों तक सीमित रहती थीं, लेकिन बाजार के विकास के बाद उन्हें व्यापार करने और अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर मिला है।

अयोध्या तक पहुंची गांव की पहचान

समूह सखी संजू देवी द्वारा बनाए गए गोबर के दीपकों ने गांव की पहचान को नई ऊंचाई दी है। उनके बनाए करीब 25 हजार दीपक अयोध्या दीपोत्सव तक पहुंचे हैं। अब वे मसाले बनाकर भी बाजार में बेच रही हैं।

वहीं गायत्री चावल बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। उनका कहना है कि पहले केवल पति की कमाई पर घर चलाना मुश्किल होता था, लेकिन अब परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई है।

आरती नमकीन और सेमी जैसे उत्पाद तैयार कर बाजार में बेचती हैं, जिससे उनकी आय बढ़ी है और घरेलू जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं।

महिलाओं के लिए अलग सुविधाओं ने बढ़ाया आत्मविश्वास

महिलाओं को व्यापार और संचालन में सुविधा देने के लिए बाजार में विशेष इंतजाम किए गए हैं। यहां महिलाओं के लिए अलग शौचालय, बैठने की व्यवस्था और सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

बाजार संचालन के लिए एक कार्यालय भी बनाया गया है, जिसकी जिम्मेदारी महिलाओं को दी गई है। इससे बाजार के संचालन में व्यवस्था और पारदर्शिता बनी हुई है।

ग्रामीण विकास का सफल उदाहरण बना सरसवां

यह हाट बाजार अब सिर्फ खरीद-बिक्री की जगह नहीं रह गया है बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और स्थानीय रोजगार सृजन का जीवंत उदाहरण बन चुका है।

जिला प्रशासन का मानना है कि यदि गांव स्तर पर ऐसे बाजार विकसित किए जाएं तो ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मिल सकते हैं और पलायन जैसी समस्याओं को भी कम किया जा सकता है।

यह बाजार आज तराई क्षेत्र में बदलाव, आत्मनिर्भरता और नई उम्मीद की एक मजबूत पहचान बन चुका है।

“देश-दुनिया से जुड़े राजनीतिक, मनोरंजन और खेल और सामयिक घटनाक्रम की विस्तृत और सटीक जानकारी के लिए ‘राष्ट्रीय प्रस्तावना’ के साथ जुड़े रहें। ताज़ा खबरों, चुनावी बयानबाज़ी और विशेष रिपोर्ट्स के लिए हमारे साथ बने रहें।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button