बालेन शाह के बयान पर भारत सख्त, कहा- भारत-नेपाल सीमा मुद्दा पूरी तरह द्विपक्षीय मामला

विदेश मंत्रालय ने सीमा विवाद में बाहरी दखल को किया खारिज, कहा- भारत-नेपाल मुद्दे द्विपक्षीय; जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग

भारत-नेपाल सीमा विवाद पर विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की मांग पर भारत ने दो टूक जवाब दिया। वहीं जम्मू-कश्मीर पर EU और पाकिस्तान के संयुक्त बयान को भी भारत ने खारिज कर दिया।

नई दिल्ली। भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि नेपाल के साथ सीमा विवाद हो या जम्मू-कश्मीर का मुद्दा, किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या टिप्पणी स्वीकार नहीं की जाएगी। विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने भारत-नेपाल सीमा विवाद के समाधान के लिए चीन और ब्रिटेन की भूमिका की बात कही थी। साथ ही, यूरोपीय संघ (EU) और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के उल्लेख पर भी भारत ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।

भारत-नेपाल सीमा विवाद पर MEA का स्पष्ट संदेश

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि भारत और नेपाल के बीच सीमा संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए पहले से स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं। ऐसे में किसी तीसरे पक्ष की कोई आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के बीच लगभग 98 प्रतिशत सीमा का सीमांकन पहले ही हो चुका है। शेष विवादित क्षेत्रों पर भी दोनों देशों के बीच स्थापित तंत्र के माध्यम से बातचीत जारी है। भारत का मानना है कि सीमा संबंधी सभी मुद्दों का समाधान आपसी संवाद और सहयोग से ही संभव है।

गंडक नदी और अतिक्रमण बने विवाद की वजह

विदेश मंत्रालय के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में सीमा संबंधी जटिलताएं गंडक नदी के समय-समय पर अपना मार्ग बदलने के कारण उत्पन्न हुई हैं। इसके अलावा, सीमा पर स्थित ‘नो-मैन्स लैंड’ में अतिक्रमण के कुछ मामलों की भी पहचान की गई है।

इन क्षेत्रों की संयुक्त मैपिंग और सर्वेक्षण की प्रक्रिया दोनों देशों की एजेंसियों द्वारा की जा रही है ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके और विवादित बिंदुओं का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

क्या कहा था नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने?

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने हाल ही में संसद में कहा था कि सीमा विवाद केवल भारत और चीन के साथ चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि इसमें ब्रिटेन की भी ऐतिहासिक भूमिका रही है। उनका तर्क था कि यह विवाद ब्रिटिश भारत के समय से जुड़ा हुआ है, इसलिए ब्रिटेन को भी इसमें रुचि लेनी चाहिए।

शाह ने यह भी स्वीकार किया था कि सीमा के दोनों ओर अतिक्रमण की घटनाएं हुई हैं और दोनों देशों को मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर पर EU-पाकिस्तान के बयान को भारत ने किया खारिज

विदेश मंत्रालय ने यूरोपीय संघ और पाकिस्तान द्वारा जारी संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर का उल्लेख किए जाने पर भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपने आंतरिक मामलों पर किसी भी बाहरी टिप्पणी को पूरी तरह अस्वीकार करता है।

उन्होंने कहा कि संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर का उल्लेख अनावश्यक और अनुचित है। जिन देशों या संस्थाओं का इस विषय में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, उन्हें ऐसे मुद्दों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

‘जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग’

विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अटूट हिस्से हैं। सरकार का रुख स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों की संवैधानिक स्थिति पर किसी भी प्रकार की विदेशी टिप्पणी या हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।

प्रवक्ता ने कहा कि भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के मुद्दों पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपना पक्ष मजबूती से रखता रहेगा।

भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं

भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर का विषय पूरी तरह आंतरिक मामला है और यदि कोई मुद्दा शेष है तो वह केवल भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है। इसी तरह नेपाल के साथ सीमा विवाद को लेकर भी भारत का रुख स्पष्ट है कि सभी मुद्दों का समाधान स्थापित द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से ही किया जाएगा।

विदेश मंत्रालय की ताजा प्रतिक्रिया ने एक बार फिर संकेत दिया है कि नई दिल्ली अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में संवाद को प्राथमिकता देती है, लेकिन किसी बाहरी मध्यस्थता या हस्तक्षेप को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है।

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