“दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉग कस्टडी विवाद में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि पालतू जानवर केवल संपत्ति नहीं बल्कि परिवार के सदस्य हैं। अदालत ने जानवरों के कल्याण और भावनात्मक जुड़ाव को प्राथमिकता दी।“
नई दिल्ली। पालतू जानवरों के अधिकार और उनके प्रति मानवीय संवेदनाओं को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पालतू जानवरों को केवल संपत्ति या वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि वे परिवार का अभिन्न हिस्सा होते हैं।
अदालत ने कहा कि किसी पालतू जानवर की कस्टडी तय करते समय केवल कानूनी स्वामित्व ही नहीं, बल्कि उसके कल्याण, देखभाल और भावनात्मक जुड़ाव को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भावनात्मक जुड़ाव को मिली कानूनी मान्यता
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि पालतू जानवर और उनके देखभाल करने वालों के बीच गहरा भावनात्मक संबंध विकसित हो जाता है। ऐसे में उन्हें अचानक अलग करना जानवरों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
अदालत ने यह भी माना कि जानवरों की कस्टडी को किसी सामान्य संपत्ति विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
मामला तब शुरू हुआ जब पुलिस और संबंधित एजेंसियों ने एक स्थान पर छापेमारी के दौरान कुछ कुत्तों को खराब परिस्थितियों में पाया। बाद में इन कुत्तों को एक पशु कल्याण संगठन की देखरेख में रखा गया, जहां से उन्हें गोद लेने वाले परिवारों को सौंप दिया गया।
इसके बाद एक अन्य पक्ष ने खुद को कुत्तों का मूल मालिक बताते हुए उनकी अस्थायी कस्टडी की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी पालतू जानवर की कस्टडी तय करते समय उसका हित सर्वोपरि होना चाहिए। अदालत ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद कुत्तों को गोद लेने वाले परिवारों के पास ही रहने देने का आदेश दिया।
साथ ही अदालत ने आवश्यक होने पर संबंधित पक्षों को उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया।
पशु अधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में पालतू जानवरों की कस्टडी से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि न्याय व्यवस्था अब पशुओं के भावनात्मक और सामाजिक महत्व को भी स्वीकार कर रही है।
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