नेपाल की ग्लेशियल बाढ़ ने बढ़ाई भारत की चिंता, हिमालय की 200 झीलों पर खतरा; 25 बेहद संवेदनशील

नेपाल में ग्लेशियल झील फटने से आई बाढ़ के बाद भारत में हिमालयी ग्लेशियल झीलों के खतरे को लेकर चिंता बढ़ी है। करीब 200 जोखिम वाली झीलों में 25 बेहद संवेदनशील हैं, जबकि 195 झीलों की पहचान GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम में की गई है।

नई दिल्ली। नेपाल में हाल में ग्लेशियल झील फटने से आई अचानक बाढ़ ने भारत के लिए भी हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते खतरे की चिंता बढ़ा दी है। इस घटना ने एक बार फिर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे और इससे निपटने की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित किया है। हिमालयी क्षेत्र में मौजूद सैकड़ों ग्लेशियल झीलें लगातार बदलती जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के बीच जोखिम का कारण बनी हुई हैं।

सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में करीब 7,500 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से करीब 200 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना जा रहा है। सिक्किम में ही ऐसी 25 झीलें बेहद संवेदनशील श्रेणी में बताई गई हैं। इन झीलों से अचानक पानी निकलने की स्थिति में निचले इलाकों में भारी तबाही का खतरा पैदा हो सकता है।

गंगा बेसिन में 4,700 ग्लेशियल झीलें

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 4,700 ग्लेशियल झीलें गंगा नदी बेसिन में स्थित हैं। इन झीलों का कैचमेंट क्षेत्र 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक बताया गया है। ऐसे में किसी झील का प्राकृतिक बांध टूटने या पानी के अचानक बाहर निकलने की स्थिति में इसका प्रभाव पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मैदानी और निचले इलाकों तक पहुंच सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न बाढ़ बेहद कम समय में बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। इसलिए जोखिम वाली झीलों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

सिक्किम में 2023 की आपदा ने दिखाया था खतरा

भारत इससे पहले भी GLOF की भयावहता का सामना कर चुका है। 3 अक्टूबर 2023 की रात सिक्किम की साउथ ल्होनक झील क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हिमनदीय चट्टानों के खिसकने की घटना हुई थी। बताया गया था कि करीब 14.7 मिलियन क्यूबिक मीटर बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा अचानक नीचे आया।

इसके बाद झील से विनाशकारी पानी का बहाव पैदा हुआ, जिसने अपने रास्ते में आने वाली बस्तियों और पनबिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी की आवश्यकता को और स्पष्ट किया।

कैसे आती है ग्लेशियल झील फटने से बाढ़?

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य कृष्णा वत्सा के अनुसार, नेपाल की घटना हिमालयी आपदाओं के एक जटिल स्वरूप की ओर संकेत करती है। ऐसे मामलों में बर्फ या चट्टान के बड़े हिस्से के गिरने से मलबा नीचे की ओर बह सकता है और अस्थायी झील का निर्माण हो सकता है।

इसके बाद यदि झील का प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है या टूट जाता है तो बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बहता है। यही स्थिति ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का रूप ले सकती है। इस तरह की घटनाएं बहुत तेजी से होती हैं, जिससे निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को चेतावनी देने के लिए समय बेहद कम बचता है।

195 झीलों की पहचान, पांच मोर्चों पर काम की जरूरत

NDMA के पूर्व सदस्य सैयद सफी अहसान रिजवी के अनुसार, भारत के नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के तहत जोखिम वाली 195 झीलों की पहचान की गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन झीलों से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए पांच प्रमुख क्षेत्रों पर तेजी से काम करने की आवश्यकता है। इनमें जोखिम का आकलन, लगातार निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, जोखिम कम करने के उपाय और स्थानीय समुदायों में जागरूकता प्रमुख हैं।

केंद्र ने बनाई थी उच्चस्तरीय समन्वय समिति

सिक्किम में GLOF की घटना के बाद केंद्र सरकार ने ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समन्वय समिति का गठन किया था।

इसका उद्देश्य विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए संवेदनशील ग्लेशियल झीलों का सर्वेक्षण करना और अधिक जोखिम वाली झीलों की पहचान करना था। इसके साथ ही जोखिम को कम करने और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।

चार हिमालयी राज्यों के लिए 150 करोड़ रुपये

सरकार ने हिमालयी क्षेत्र के चार राज्यों में ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरे को कम करने के लिए नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के तहत 150 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण समन्वय समिति की नवंबर 2024 में हुई पहली बैठक में जोखिम के आकलन, निगरानी और उसे कम करने के उपायों पर आधारित त्रि-आयामी रणनीति पर सहमति बनी थी।

कई एजेंसियां मिलकर कर रहीं संवेदनशील झीलों का आकलन

सरकार की ओर से पहले बताया गया था कि उच्च जोखिम वाली श्रेणी की झीलों का आकलन करने के लिए विभिन्न एजेंसियों ने संयुक्त अभियान चलाए हैं। इन अभियानों में NDMA, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, सी-डैक, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सेना के वैज्ञानिक तथा अधिकारी शामिल रहे हैं।

इन एजेंसियों के बीच नियमित बैठकें और फीडबैक की प्रक्रिया भी अपनाई गई है, ताकि राज्यों और केंद्र के बीच समन्वित रणनीति तैयार की जा सके।

नेपाल की घटना से फिर बढ़ा निगरानी पर जोर

नेपाल में ग्लेशियल झील फटने की हालिया घटना ने हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियल झीलों के जोखिम को एक बार फिर सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम और हिमालयी भूगोल में हो रहे बदलावों को देखते हुए केवल झीलों की पहचान पर्याप्त नहीं है।

जोखिम वाली झीलों की लगातार निगरानी, समय रहते चेतावनी, प्रभावित क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करना जरूरी है। नेपाल की घटना ने भारत के सामने भी यह सवाल खड़ा किया है कि संवेदनशील ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं को जमीन पर कितना प्रभावी बनाया जा सकता है।

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