बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ पिता की नहीं, मां को भी देना होगा योगदान: इलाहाबाद हाई कोर्ट

“इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ पिता की नहीं है। माता-पिता दोनों की आय और आर्थिक क्षमता के अनुसार योगदान तय किया जाना चाहिए।“

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की आर्थिक जिम्मेदारी केवल पिता पर नहीं डाली जा सकती। माता-पिता दोनों को अपनी आय, आर्थिक स्थिति और भुगतान करने की क्षमता के अनुसार बच्चों के पालन-पोषण में योगदान देना चाहिए।

न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की एकलपीठ ने यह टिप्पणी जौनपुर निवासी अर्चना राव और उनके दो नाबालिग बच्चों की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बच्चों के लिए पिता को 1,500-1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

माता-पिता दोनों की आर्थिक स्थिति देखना जरूरी

हाई कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण का दावा केवल पिता के खिलाफ ही नहीं माना जा सकता। भरण-पोषण की राशि निर्धारित करते समय माता और पिता, दोनों की आर्थिक स्थिति तथा उनकी भुगतान करने की क्षमता पर विचार किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत बच्चों के भरण-पोषण के दावे के संदर्भ में यह बात कही। न्यायालय के अनुसार, बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए माता-पिता की वास्तविक आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखना आवश्यक है।

मां की आय अधिक होने पर योगदान से इनकार नहीं

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मां की आय पिता से अधिक है तो केवल इस आधार पर कि बच्चे उसके साथ रह रहे हैं, वह उनके भरण-पोषण में आर्थिक योगदान से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकती।

अदालत ने कहा कि बच्चों के साथ कौन सा अभिभावक रह रहा है, यह तथ्य अकेले यह तय नहीं करता कि उनकी पूरी आर्थिक जिम्मेदारी उसी अभिभावक या दूसरे अभिभावक पर डाल दी जाए।

पति ने कम आय का दिया था तर्क

मामले में पति की ओर से दलील दी गई थी कि उसकी आय पत्नी की तुलना में कम है। वह जूनियर हाईस्कूल में इंस्ट्रक्टर के रूप में कार्यरत है और उसकी मासिक आय करीब 9,000 रुपये बताई गई।

कोर्ट ने इस पहलू को भी भरण-पोषण तय करने में प्रासंगिक माना। न्यायालय ने कहा कि बच्चों के हित में निर्णय लेते समय सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के साथ-साथ दोनों अभिभावकों की वित्तीय क्षमता पर भी विचार किया जाना चाहिए।

परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी

अर्चना राव और उनके दो नाबालिग बच्चों ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके तहत पिता को दोनों बच्चों के लिए 1,500-1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति पर विचार करने के बाद पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। कोर्ट की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि बच्चों के भरण-पोषण का दायित्व तय करते समय माता-पिता दोनों की आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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