
“WMO की नई रिपोर्ट के मुताबिक धरती का जल चक्र तेजी से अनियमित और अप्रत्याशित हो रहा है। 2025 में वैश्विक नदी प्रवाह 35 वर्षों के सबसे सूखे वर्षों में रहा और हर प्रमुख हिमनद क्षेत्र में लगातार चौथे साल बर्फ का नुकसान हुआ।“
नई दिल्ली। धरती का जल चक्र लगातार अधिक अनियमित और अप्रत्याशित होता जा रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन रही है तो कहीं सूखे और जल की कमी का खतरा बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की नई State of Global Water Resources रिपोर्ट ने दुनिया के जल संसाधनों को लेकर गंभीर तस्वीर पेश की है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियरों के लगातार पिघलने, भूजल के घटते स्तर और धरती पर उपलब्ध मीठे पानी के भंडारण में लंबे समय से जारी गिरावट के बीच 2025 में वैश्विक नदी प्रवाह 35 वर्षों के सबसे सूखे वर्षों में शामिल रहा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले सात वर्षों में सामान्य नदी प्रवाह वाले बेसिनों की संख्या 1991 के बाद सबसे कम रही है।
लगातार चौथे साल हर प्रमुख हिमनद क्षेत्र में बर्फ का नुकसान
WMO की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष ग्लेशियरों को लेकर है। 2025 में लगातार चौथे साल दुनिया के हर प्रमुख हिमनद क्षेत्र में बर्फ के द्रव्यमान में कमी दर्ज की गई।
हाइड्रोलॉजिकल वर्ष 2025 में दुनिया के ग्लेशियरों ने करीब 408 गीगाटन (±132 गीगाटन) बर्फ का द्रव्यमान खोया। WMO के मुताबिक यह मात्रा समुद्र के स्तर में करीब 1.1 मिलीमीटर (±0.4 मिलीमीटर) की वृद्धि के बराबर है।
वर्ष 2023 से 2025 के बीच ग्लेशियरों से कुल करीब 1,400 गीगाटन पानी के बराबर द्रव्यमान का नुकसान हुआ। WMO ने इसकी तुलना करीब 56 करोड़ ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूलों में समाने वाले पानी से की है।
जल चक्र में बढ़ रही अस्थिरता
WMO के मुताबिक जल चक्र के कुछ हिस्से तेजी से प्रतिक्रिया करते हैं। बारिश, नदियों का बहाव और मिट्टी की नमी जैसे घटक कुछ दिनों या हफ्तों में मौसम के बदलाव का असर दिखाते हैं। वहीं भूजल, ग्लेशियर और मौसमी बर्फ जैसे जल भंडार धीरे-धीरे जमा होते या घटते हैं और इनका असर वर्षों से दशकों तक बना रह सकता है।
WMO महासचिव सेलेस्टे साउलो ने इन धीमे जल भंडारों की तुलना पृथ्वी के ‘सेविंग्स अकाउंट’ से की। उनके अनुसार ये भंडार खराब मौसम या सूखे के वर्षों में पानी की उपलब्धता को बनाए रखने में मदद करते हैं, लेकिन दुनिया इस प्राकृतिक बचत को लगातार कम कर रही है।
2025 में 36 प्रतिशत वैश्विक बेसिन क्षेत्र में सामान्य से कम नदी प्रवाह
रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में दुनिया के करीब 36 प्रतिशत नदी बेसिन क्षेत्र में नदी का प्रवाह सामान्य से कम रहा। यह आंकड़ा 13 वैश्विक हाइड्रोलॉजिकल मॉडलों से प्राप्त सिमुलेशन और वास्तविक मौसम संबंधी आंकड़ों पर आधारित है।
पिछले सात वर्षों में सामान्य नदी प्रवाह वाली बेसिनों की संख्या स्पष्ट रूप से अल्पमत में रही। इस दौरान सामान्य स्थिति वाली बेसिनों का हिस्सा करीब 34 से 38 प्रतिशत के बीच रहा, जबकि 1991-2020 के औसत में यह आंकड़ा करीब 46 प्रतिशत था।
इससे संकेत मिलता है कि नदियों के बहाव में सामान्य मौसमी पैटर्न की तुलना में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
एशिया और अफ्रीका पर सबसे अधिक असर
रिपोर्ट में जल-संबंधी चरम घटनाओं के भौगोलिक प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। पिछले पांच वर्षों के दौरान एशिया और अफ्रीका ने संयुक्त रूप से दर्ज की गई जल-संबंधी चरम घटनाओं में कम से कम आधे हिस्से का प्रतिनिधित्व किया।
इन घटनाओं से संबंधित दर्ज मौतों में इन दोनों महाद्वीपों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही। WMO ने यह भी रेखांकित किया है कि एशिया और अफ्रीका अभी भी जल संबंधी निगरानी और हाइड्रोलॉजिकल डेटा के मामले में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र हैं, जबकि जलवायु और जल संबंधी चरम घटनाओं का प्रभाव यहां अधिक दिखाई दे रहा है।
भूजल में भी बढ़ रहा घाटा
धरती पर पानी के संकट का एक महत्वपूर्ण संकेत भूजल के स्तर में बदलाव है। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में दुनिया भर में निगरानी किए गए करीब दो-तिहाई कुओं में भूजल की स्थिति ऐतिहासिक सामान्य सीमा से बाहर रही।
2022 से 2025 के बीच अमेरिका, यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में लगातार भूजल घाटा दर्ज किया गया। उत्तर-पश्चिमी भारत सहित कई क्षेत्रों में सामान्य से कम या बहुत कम भूजल स्तर देखा गया।
WMO के मुताबिक यह स्थिति कई क्षेत्रों में कई वर्षों से जारी सूखे और पानी के संचयी इस्तेमाल के कारण पैदा हो रहे दबाव की ओर संकेत करती है।
2014-16 के बाद से घट रहा धरती का जल भंडार
रिपोर्ट के अनुसार धरती पर मौजूद कुल स्थलीय जल भंडारण में 2014-2016 के बाद से लगातार गिरावट का रुझान दिखाई दे रहा है। इसमें भूजल, झीलें, नदियां, मिट्टी की नमी, वनस्पति, बर्फ और ग्लेशियरों में मौजूद पानी शामिल है।
2021 से 2025 के बीच दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका, पैटागोनिया, उपोष्णकटिबंधीय एंडीज, गंगा-सिंधु के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र, उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व, मध्य एशिया और पूर्वी चीन के कई हिस्सों में सामान्य से कम स्थलीय जल भंडारण बार-बार देखा गया।
2025 में उत्तरी और दक्षिण-पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, पैटागोनिया, पूर्वी यूरोप, मध्य पूर्व, मध्य एशिया, पूर्वी ब्राजील, उत्तरी भारत, उत्तरी यूरोप के कुछ हिस्सों, रूस, चीन और उत्तरी अफ्रीका में भी सामान्य से कम जल भंडारण दर्ज किया गया।
नदियों में भी दिखा क्षेत्रीय असंतुलन
2021 से 2025 के बीच अमेजन और ला प्लाटा बेसिन, उत्तरी अमेरिका, मध्य और पूर्वी अफ्रीका, मध्य एशिया तथा मध्य पूर्व के कई हिस्सों में लगातार सामान्य से कम नदी प्रवाह देखा गया।
दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा दक्षिण अमेरिका के उत्तरी हिस्सों में 2025 के दौरान सामान्य से अधिक नदी प्रवाह दर्ज किया गया। अफ्रीका में सेनेगल, नाइजर, लेक चाड, ऑरेंज और लिम्पोपो बेसिन में प्रवाह सामान्य से अधिक रहा, जबकि नील, कांगो और जाम्बेजी बेसिन में सामान्य से काफी कम प्रवाह दर्ज किया गया।
बाढ़ और सूखे का खतरा एक साथ बढ़ रहा
WMO के अनुसार पिछले पांच वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़ और सूखे दोनों की रिकॉर्ड स्तर की घटनाएं सामने आई हैं। कुछ क्षेत्रों में एक चरम घटना के बाद दूसरी घटना के बीच पर्याप्त रिकवरी का समय भी नहीं मिला।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत होता El Niño कुछ क्षेत्रों में सूखे और अन्य क्षेत्रों में बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकता है। इस तरह जल चक्र में बढ़ती अस्थिरता आने वाले समय में जल प्रबंधन और आपदा तैयारी के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
भारत के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत
WMO की रिपोर्ट में उत्तरी भारत को उन क्षेत्रों में शामिल किया गया है जहां 2025 में स्थलीय जल भंडारण सामान्य से कम रहा। वहीं उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में 2022-2025 के दौरान लगातार सामान्य से कम भूजल स्तर दर्ज किया गया।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि कृषि, पेयजल, उद्योग और करोड़ों लोगों की आजीविका बड़ी मात्रा में मानसून, नदियों, भूजल और हिमालयी जल स्रोतों पर निर्भर है।
हिमनद पिघलने का दोहरा असर
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना शुरुआत में कुछ क्षेत्रों में नदियों के प्रवाह को बढ़ा सकता है, लेकिन लंबे समय में यही प्रक्रिया पानी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है। WMO के अनुसार काकेशस, पश्चिमी कनाडा, अमेरिका और मध्य यूरोप जैसे छोटे ग्लेशियरों वाले कुछ क्षेत्र संभवतः ‘पीक वाटर’ की स्थिति तक पहुंच चुके हैं।
‘पीक वाटर’ वह स्थिति है जब ग्लेशियर के पिघलने से नदी में आने वाला पानी अधिकतम स्तर पर पहुंच जाता है। इसके बाद ग्लेशियर के छोटे होने के साथ लंबे समय में पिघले पानी की उपलब्धता घट सकती है।
साझा डेटा और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था पर जोर
WMO महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा कि पानी सीमाओं को नहीं मानता। किसी नदी बेसिन का जल संतुलन कई देशों में होने वाली गतिविधियों से प्रभावित हो सकता है। इसी तरह एक देश में ग्लेशियरों का पीछे हटना सैकड़ों किलोमीटर दूर रहने वाली आबादी के लिए पानी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।
इसी वजह से WMO ने साझा डेटा, साझा मानकों और साझा शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने पर जोर दिया है। संगठन के अनुसार जल संसाधनों की बेहतर निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था भविष्य के बाढ़, सूखे और जल संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
जल संसाधनों के भविष्य के लिए बड़ा संकेत
WMO की पांच वर्षीय समीक्षा यह संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव बारिश, नदियों के प्रवाह, भूजल, ग्लेशियरों, बर्फ और धरती पर उपलब्ध कुल मीठे पानी के भंडारण पर भी पड़ रहा है।
रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि एक ओर दुनिया के कई हिस्से बाढ़ जैसी अत्यधिक जल घटनाओं से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई क्षेत्रों में नदियों, भूजल और ग्लेशियरों के घटते भंडार भविष्य की जल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं।
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