“एटा में हिरासत में मौत के 21 साल पुराने मामले में अदालत ने दरोगा गजराज सिंह और सिपाही महावीर सिंह को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। दोनों पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।“
एटा। उत्तर प्रदेश के एटा में पुलिस हिरासत में हुई मौत के करीब 21 साल पुराने मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। जैथरा थाना क्षेत्र में वर्ष 2005 में हुई मोहरपाल की मौत के मामले में सत्र न्यायालय ने तत्कालीन दरोगा गजराज सिंह और सिपाही महावीर सिंह को दोषी करार दिया है। अदालत ने दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही दोनों दोषियों पर 25-25 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता रेशपाल सिंह राठौर के मुताबिक, सुनवाई के दौरान गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों को अदालत के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने दोनों पुलिसकर्मियों को दोषी माना।
26 अगस्त 2005 को पुलिस थाने ले गई थी
मामला जैथरा थाना क्षेत्र के गांव बहगों का है। मृतक के बेटे सुनील कुमार के अनुसार, 26 अगस्त 2005 को पुलिस उनके पिता मोहरपाल को पकड़कर थाने ले गई थी। अगले दिन उनकी मौत होने की जानकारी मिली। परिवार का आरोप था कि पुलिस हिरासत में उनके साथ मारपीट की गई, जिसके दौरान उनकी मौत हो गई।
परिजनों के मुताबिक, जब वे मोहरपाल के बारे में जानकारी लेने थाने पहुंचे तो उन्हें वहां से भगा दिया गया। बाद में परिवार को पता चला कि शव भी गायब कर दिया गया है।
काली नदी में शव फेंकने का था आरोप
परिजनों ने आरोप लगाया था कि हिरासत में मौत के बाद पुलिसकर्मियों ने मोहरपाल के शव को वाहन में रखा और काली नदी में फेंक दिया। घटना की जानकारी फैलने के बाद ग्रामीणों और परिजनों में आक्रोश फैल गया और थाने पर हंगामा हुआ।
बाद में मोहरपाल का शव बरामद किया गया। इसके बाद तत्कालीन थाना प्रभारी समेत पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या, मारपीट और साक्ष्य मिटाने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया।
पंचायत चुनाव के बाद हुआ था विवाद
परिजनों के मुताबिक, वर्ष 2005 में प्रधानी के चुनाव के बाद गांव में दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था। दोनों पक्षों की ओर से थाने में शिकायतें दी गई थीं। इसी मामले में तत्कालीन सिपाही महावीर सिंह और दरोगा गजराज सिंह ने मोहरपाल को पूछताछ के लिए थाने बुलाया था।
आरोप है कि थाने में मोहरपाल के साथ बेरहमी से मारपीट की गई और बाद में उनकी मौत हो गई।
सीबीसीआईडी ने की मामले की जांच
घटना के बाद मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई थी। जांच पूरी होने के बाद आरोप पत्र अदालत में दाखिल किया गया। इसके बाद करीब दो दशक तक मामले की सुनवाई चली।
लंबी सुनवाई के दौरान मामले में आरोपी तत्कालीन थाना प्रभारी और वाहन चालक की मृत्यु हो गई। इसके बाद दरोगा गजराज सिंह और सिपाही महावीर सिंह के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जारी रही।
21 साल बाद परिवार को मिला न्याय
मृतक के बेटे सुनील कुमार ने बताया कि पिता की मौत के बाद परिवार को न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उनका कहना है कि मुकदमे की पैरवी के दौरान परिवार को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा और यहां तक कि खेती भी बेचनी पड़ी।
मृतक की पत्नी गुड्डी देवी ने बताया कि घटना के समय उनके बच्चे छोटे थे। पति की मौत के बाद परिवार ने बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन गुजारा। वर्षों से परिवार को अदालत के फैसले का इंतजार था।
21 साल बाद आए फैसले के बाद परिवार ने राहत की सांस ली है।









