लखनऊ में सहायता प्राप्त कॉलेजों की जमीनों पर कब्जे की कोशिशें, सात संस्थान निशाने पर

दान से स्थापित शिक्षण संस्थानों के अस्तित्व पर संकट, शिक्षा विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल

Lucknow Aided Colleges Land Dispute News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सात सहायता प्राप्त विद्यालयों और कॉलेजों की जमीन पर कब्जे के प्रयासों का मामला सामने आया है। शिक्षा विभाग, प्रबंधन और बाहरी प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

लखनऊ। राजधानी लखनऊ के कई पुराने सहायता प्राप्त विद्यालयों और इंटर कॉलेजों की जमीनों पर कथित कब्जे के प्रयासों का मामला सामने आने के बाद शिक्षा जगत में चिंता बढ़ गई है। विभिन्न मामलों में प्रभावशाली लोगों, प्रबंधन समितियों और विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो गरीब और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने वाले कई ऐतिहासिक संस्थान अस्तित्व के संकट में पड़ सकते हैं।

सात संस्थानों की जमीनों पर कब्जे के प्रयास का दावा

जानकारी के अनुसार लखनऊ में अब तक कम से कम सात सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों की जमीनों को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं। इनमें लखनऊ इंटर कॉलेज, सरस्वती कन्या इंटर कॉलेज, सेंटीनियल इंटर कॉलेज, एडेड जूनियर हाईस्कूल लालबाग, चुटकी भंडार इंटर कॉलेज और हाल में विद्या मंदिर गर्ल्स हाईस्कूल जैसे संस्थानों के नाम शामिल बताए जा रहे हैं।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का आरोप है कि कई मामलों में विद्यालयों की संपत्तियों को लेकर कानूनी विवाद खड़े किए गए, जबकि कुछ मामलों में कब्जे की कोशिशें भी सामने आईं।

क्या कहता है कानून?

सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों की संपत्तियों के संबंध में लागू नियमों के अनुसार किसी भी संस्था की जमीन या भवन को बेचने, हस्तांतरित करने अथवा किसी अन्य पक्ष को देने के लिए संबंधित शिक्षा निदेशक की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है।

नियमों में स्पष्ट उल्लेख है कि बिना लिखित अनुमति के किया गया कोई भी ऐसा लेनदेन कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में विभागीय स्तर पर निगरानी और समय पर हस्तक्षेप बेहद जरूरी है।

विद्या मंदिर गर्ल्स हाईस्कूल प्रकरण में उठे सवाल

हाल ही में नरही स्थित विद्या मंदिर गर्ल्स हाईस्कूल से जुड़ा विवाद चर्चा में रहा। इस मामले में विद्यालय प्रबंधन, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठाए गए हैं।

आलोचकों का कहना है कि यदि विद्यालय से जुड़े विवाद की सूचना समय पर संबंधित विभागों को दी गई होती और निरीक्षण की प्रभावी व्यवस्था होती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती।

शिक्षा विभाग और प्रबंधन पर आरोप

माध्यमिक शिक्षक संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि कुछ मामलों में शिक्षा विभाग और प्रबंधन समितियों के बीच समन्वय की कमी सामने आई है। उनका आरोप है कि प्रभावशाली तत्वों द्वारा संस्थानों की संपत्तियों पर नजर रखी जा रही है और समय पर कार्रवाई न होने से ऐसे प्रयासों को बढ़ावा मिलता है।

हालांकि इन आरोपों पर संबंधित विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

पुराने मामलों ने भी बढ़ाई चिंता

लखनऊ इंटर कॉलेज

करीब एक दशक पहले विद्यालय भवन को जर्जर बताकर तोड़ने की कोशिश का मामला सामने आया था। तत्कालीन प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद स्थिति नियंत्रित हुई थी।

एडेड जूनियर हाईस्कूल, लालबाग

इस विद्यालय की जमीन को लेकर विवाद ने राजनीतिक रंग भी लिया था। मामले में पुलिस और प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

सेंटीनियल इंटर कॉलेज

वर्ष 2022 में कॉलेज परिसर पर कथित अवैध कब्जे का मामला चर्चा में आया था। बाद में प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए परिसर को मुक्त कराया गया और कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई।

सरस्वती कन्या इंटर कॉलेज

विद्यालय की जमीन की कथित रजिस्ट्री का मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन के हस्तक्षेप से विवादित दस्तावेज निरस्त किए गए थे।

संस्थानों की सुरक्षा की मांग तेज

शिक्षक संगठनों और अभिभावकों का कहना है कि सहायता प्राप्त विद्यालय केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं बल्कि सामाजिक धरोहर हैं। इन संस्थानों ने दशकों तक आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को शिक्षा उपलब्ध कराई है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को सभी सहायता प्राप्त संस्थानों की संपत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर नियमित निरीक्षण व्यवस्था लागू करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के कब्जे या विवाद की आशंका को रोका जा सके।

बढ़ी जवाबदेही की मांग

मामले के सामने आने के बाद शिक्षकों, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि कहीं अनियमितता हुई है तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो भी स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि शैक्षणिक संस्थानों की विश्वसनीयता और सुरक्षा बनी रहे।

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