“लखनऊ पुलिस ने विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग में चल रहे अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर का भंडाफोड़ करते हुए 119 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गिरोह अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाकर गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला नेटवर्क के जरिए करोड़ों रुपये की ठगी करता था।“
लखनऊ। विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर दिन में सब कुछ सामान्य दिखाई देता था। दफ्तर शांत रहता था और किसी को अंदाजा तक नहीं था कि रात ढलते ही यही जगह अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी के बड़े अड्डे में बदल जाती है। देर रात सैकड़ों कॉल एक साथ शुरू होती थीं, विदेशी लहजे में बातचीत होती थी और हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों का डाटा कंप्यूटर स्क्रीन पर खुलता था।
सुबह होने से पहले काम समाप्त हो जाता और कर्मचारी अपने-अपने फ्लैटों की ओर लौट जाते। इसी वजह से लंबे समय तक किसी को इस पूरे नेटवर्क पर शक नहीं हुआ।
अमेरिका के नागरिकों को बनाते थे निशाना
जांच एजेंसियों के अनुसार यह गिरोह मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाता था। आरोपी खुद को प्रतिष्ठित कंपनियों, बैंक अधिकारियों या सरकारी एजेंसियों का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते, भ्रमित करते और उनसे धन ऐंठ लेते थे।
साइबर ठगी के लिए इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म, वीओआईपी तकनीक और डिजिटल भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे उनकी गतिविधियों का पता लगाना मुश्किल हो जाता था।
गिफ्ट कार्ड से रूस, फिर चीन और उसके बाद भारत
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ठगी की रकम सीधे बैंकिंग चैनलों के जरिए भारत नहीं लाई जाती थी। अमेरिका में मौजूद नेटवर्क से जुड़े लोग पीड़ितों से प्राप्त रकम को पहले गिफ्ट कार्ड और डिजिटल वाउचर में परिवर्तित कराते थे।
इसके बाद इन गिफ्ट कार्डों को रूस भेजा जाता था, जहां से रकम चीन के नेटवर्क तक पहुंचती थी और अंततः हवाला चैनलों के माध्यम से भारत लाई जाती थी। इसके बाद रकम को नेटवर्क से जुड़े संचालकों और सहयोगियों के बीच बांट दिया जाता था।
जांच अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की बहुस्तरीय वित्तीय लेयरिंग के कारण धन के वास्तविक स्रोत तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और प्रत्येक चरण की पुष्टि में काफी समय लग सकता है।
अहमदाबाद से जुड़े होने के मिले संकेत
सूत्रों के मुताबिक, जांच में इस नेटवर्क के संचालन से जुड़े कुछ प्रमुख लोगों के तार गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और अन्य राज्यों से जुड़े मिले हैं। पुलिस इस पूरे नेटवर्क की वित्तीय और तकनीकी संरचना की गहराई से जांच कर रही है।
हालांकि, जांच एजेंसियों ने मामले के सभी संदिग्धों की भूमिका की पुष्टि होने तक आधिकारिक रूप से किसी व्यक्ति को मास्टरमाइंड घोषित नहीं किया है और जांच अभी जारी है।
कर्मचारियों को थी पूरी जानकारी
पुलिस सूत्रों के अनुसार कॉल सेंटर में काम करने वाले अधिकांश कर्मचारियों को इस बात की जानकारी थी कि वे किसी वैध ग्राहक सेवा केंद्र का हिस्सा नहीं, बल्कि साइबर ठगी के संगठित नेटवर्क के लिए काम कर रहे हैं।
रात के समय संचालन और पेशेवर कॉरपोरेट माहौल के कारण गतिविधियां सामान्य बीपीओ या कॉल सेंटर जैसी प्रतीत होती थीं, जिससे लंबे समय तक किसी को संदेह नहीं हुआ।
पुलिस करेगी बिल्डिंग प्रबंधन से पूछताछ
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि कार्यालय किराए पर देने से पहले आवश्यक सत्यापन प्रक्रिया पूरी की गई थी या नहीं। इसके लिए बिल्डिंग प्रबंधन और संबंधित पक्षों से पूछताछ की जाएगी।
पुलिस यह भी जांच कर रही है कि बरामद कंप्यूटर डेटा और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर इस गिरोह ने अब तक कितने लोगों को अपना शिकार बनाया और ठगी की कुल रकम कितनी है।
कई एजेंसियों ने मिलकर की कार्रवाई
छापेमारी के दौरान संयुक्त पुलिस आयुक्त अपराध अपर्णा कुमार, संयुक्त पुलिस आयुक्त कानून-व्यवस्था बबलू कुमार, साइबर अपराध से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी, विभूतिखंड थाना पुलिस और साइबर सेल की टीमें मौजूद रहीं।
लखनऊ पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई राज्य में साइबर अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की बड़ी सफलता है और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश जारी है।
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