भारत पर ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा: 150 साल का रिकॉर्ड टूटने की आशंका, भीषण गर्मी के साथ सूखा और बाढ़ का डबल अटैक

प्रशांत महासागर में बन रही खतरनाक मौसमी घटना से भारत में बिगड़ सकते हैं हालात, मानसून और खेती पर सबसे बड़ा संकट

भारत में सुपर अल नीनो के खतरे से भीषण गर्मी, सूखा और बाढ़ की आशंका बढ़ गई है। IMD और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2026-27 का अल नीनो 1877 से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। जानिए मानसून, किसानों और अर्थव्यवस्था पर इसका असर।

नई दिल्ली। देश इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात समेत कई राज्यों में पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले महीनों में हालात और ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली ‘सुपर अल नीनो’ तेजी से विकसित हो रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह सुपर अल नीनो 1877 की ऐतिहासिक और विनाशकारी घटना से भी अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। इसका असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश में सूखा, बाढ़, फसल संकट और आर्थिक नुकसान जैसी गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं। सबसे बड़ा खतरा दक्षिण-पश्चिम मानसून पर मंडरा रहा है, जो भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।

देशभर में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, कई शहरों में पारा 47 डिग्री के पार

देश के कई हिस्सों में गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। दिल्ली-एनसीआर में लगातार लू चल रही है, जबकि उत्तर प्रदेश के बांदा में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। अहमदाबाद, नागपुर और विदर्भ क्षेत्र में भीषण गर्मी से लोग परेशान हैं।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने कई राज्यों में ‘हीटवेव’ और ‘सीवियर हीटवेव’ का अलर्ट जारी किया है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो की वजह से गर्म हवाएं और ज्यादा तीव्र हो सकती हैं, जिससे जून और जुलाई में भी सामान्य से अधिक गर्मी बनी रह सकती है।

क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ती है गर्मी?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब बनती है जब पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। समुद्र का यह बढ़ा हुआ तापमान वैश्विक हवाओं और मौसम चक्र को प्रभावित करता है।

इसकी वजह से दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है। भारत में इसका सीधा असर मानसून पर पड़ता है। आमतौर पर मजबूत अल नीनो की स्थिति में मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे बारिश कम होती है और सूखे की स्थिति बनने लगती है।

मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, अल नीनो हर दो से सात साल में बनता है और इसका असर कई महीनों तक बना रह सकता है। इस बार इसकी तीव्रता बेहद ज्यादा बताई जा रही है, इसलिए इसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जा रहा है।

1877 से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है यह सुपर अल नीनो

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से तीन डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है। इससे पहले 1877 में दर्ज सुपर अल नीनो के दौरान तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई थी।

1877 की घटना को दुनिया के सबसे विनाशकारी जलवायु संकटों में गिना जाता है। उस समय एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में भीषण सूखा और अकाल पड़ा था। लाखों लोगों की मौत हुई थी और वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट गहरा गया था।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस बार सुपर अल नीनो का प्रभाव और ज्यादा बढ़ता है तो दुनिया के कई देशों में चरम मौसम देखने को मिल सकता है। कहीं सूखा पड़ेगा तो कहीं अचानक भारी बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति बनेगी।

भारत के मानसून पर सबसे बड़ा असर

भारत की लगभग 70 प्रतिशत वार्षिक बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। खेती-किसानी, जलाशय, बिजली उत्पादन और पीने के पानी की व्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है।

मजबूत अल नीनो की स्थिति में मानसून कमजोर पड़ सकता है। मौसम विभाग के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इस साल सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। यदि ऐसा होता है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है और किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

देश के लगभग 60 प्रतिशत किसान अभी भी मानसून आधारित खेती पर निर्भर हैं। बारिश में कमी आने से धान, दाल, मक्का और तिलहन जैसी फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर खाद्य कीमतों और महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है।

कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ का खतरा

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, सुपर अल नीनो का असर पूरे देश में एक जैसा नहीं होगा। उत्तर भारत, पश्चिम भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका है। वहीं दक्षिण भारत और तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश हो सकती है।

विशेष रूप से चेन्नई और तमिलनाडु के तटीय इलाकों में भारी वर्षा और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इससे शहरी बाढ़, जलभराव और जनजीवन प्रभावित होने की आशंका है।

शहर क्यों बन रहे हैं ‘हीट आइलैंड’?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वैश्विक जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि स्थानीय कारण भी गर्मी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं।

शहरों में तेजी से बढ़ता कंक्रीट का जाल, वाहनों का धुआं, एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्म हवा और हरियाली की कमी शहरों को ‘हीट आइलैंड’ में बदल रही है। यही वजह है कि महानगरों में तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा दर्ज किया जा रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ा खतरा

अतीत के अल नीनो घटनाक्रमों ने दुनिया को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया है। 1982-83 के अल नीनो से वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर का नुकसान हुआ था। वहीं 1997-98 के अल नीनो को ‘सदी का अल नीनो’ कहा गया था, जिसने दुनिया भर में भारी तबाही मचाई थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बार सुपर अल नीनो लंबे समय तक सक्रिय रहता है तो कृषि, ऊर्जा, जल संसाधन और स्वास्थ्य क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है। भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश के लिए यह चुनौती और भी बड़ी हो सकती है।

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