खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले में यूपी सबसे आगे, दूध-मावा-पनीर से मिठाइयों तक गुणवत्ता पर सवाल

खाद्य पदार्थों में मिलावट और घटिया गुणवत्ता के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। एफएसएसएआई की रिपोर्ट के अनुसार दूध, पनीर, मावा और मिठाइयों समेत कई खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं।

इंदौर। देशभर में खाद्य पदार्थों में मिलावट और उनकी गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की हालिया रिपोर्ट ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती की तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में देशभर में जांचे गए खाद्य नमूनों में बड़ी संख्या तय गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी। सबसे अधिक मिलावट के मामले उत्तर प्रदेश में सामने आने की बात कही गई है।

खाद्य पदार्थों में मिलावट का मुद्दा केवल उन उत्पादों तक सीमित नहीं है, जिनके सेवन से तत्काल स्वास्थ्य खतरा पैदा हो सकता है। निर्धारित गुणवत्ता मानक से कम पाए जाने वाले खाद्य उत्पाद भी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हैं। खासकर दूध, पनीर, मावा और मिठाइयों जैसे रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर सवाल गंभीर हैं।

6.47 लाख से अधिक खाद्य नमूनों की जांच

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में देशभर में 6,47,408 खाद्य नमूनों की जांच की गई। इनमें से 34,388 नमूने निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरे। जांच में सामने आए ऐसे नमूनों में 22,516 यानी करीब 65.5 प्रतिशत नमूने गुणवत्ता के निर्धारित मानक से कम पाए गए।

इसके अलावा 7,945 नमूने असुरक्षित पाए गए, जबकि 3,931 नमूनों में लेबलिंग अथवा अन्य अनुपालन संबंधी खामियां सामने आईं। आंकड़े बताते हैं कि खाद्य सुरक्षा की चुनौती सिर्फ मिलावट रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि बाजार में उपलब्ध उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।

यूपी में सबसे ज्यादा मिलावट के मामले

एफएसएसएआई की रिपोर्ट के अनुसार खाद्य पदार्थों में मिलावट के सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में पाए गए हैं। प्रदेश में दूध और उससे बने उत्पादों के साथ-साथ अन्य खाद्य पदार्थों की जांच के दौरान भी मानकों से जुड़ी कमियां सामने आती रही हैं।

बाजार में बिकने वाला दूध, पनीर, मावा और मिठाइयां बड़ी संख्या में लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा हैं। ऐसे में इन उत्पादों की गुणवत्ता में कमी का सीधा असर आम उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। त्योहारी सीजन में मावा और मिठाइयों की मांग बढ़ने के साथ खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने निगरानी की चुनौती और बढ़ जाती है।

मध्य प्रदेश में हर 56वां नमूना मानक से कम

मध्य प्रदेश में भी खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर तस्वीर चिंताजनक है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में जांचे गए हर 56वें नमूने में उत्पाद निर्धारित गुणवत्ता मानक पर खरा नहीं उतरा।

यह स्थिति बताती है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़ी समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों में खाद्य नमूनों की जांच के दौरान गुणवत्ता, सुरक्षा और लेबलिंग से संबंधित खामियां सामने आ रही हैं।

मिलावट से ज्यादा चिंता घटिया गुणवत्ता की

खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ऐसी मिलावट पकड़ना नहीं है, जिससे खाद्य पदार्थ सीधे असुरक्षित हो जाए। निर्धारित मानक से कम गुणवत्ता वाले उत्पाद भी लंबे समय में उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

दूध में मिलावट, नकली या घटिया मावा, मानकों से कम गुणवत्ता वाला पनीर और मिलावटी मिठाइयां उपभोक्ताओं के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित नमूना जांच, प्रभावी निगरानी और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है।

असुरक्षित भोजन से 200 से अधिक बीमारियों का खतरा

दूषित भोजन में हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या रसायन मौजूद होने पर यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे भोजन से दस्त, उल्टी और पेट के संक्रमण जैसी सामान्य समस्याओं से लेकर गंभीर बीमारियों तक का खतरा हो सकता है। कुछ दूषित पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का जोखिम भी बढ़ सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2026 के आकलन के अनुसार, दुनियाभर में असुरक्षित भोजन के कारण हर साल करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं, जबकि लगभग 15.2 लाख लोगों की मौत होती है।

बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक खाद्य प्रदूषण

असुरक्षित भोजन का खतरा छोटे बच्चों के लिए विशेष रूप से गंभीर माना जाता है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर खाद्य जनित बीमारियों का असर अधिक पड़ सकता है। रसायनों के संपर्क में आने से बच्चों के मस्तिष्क के विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

सीसा और अकार्बनिक आर्सेनिक जैसे हानिकारक तत्वों के संपर्क को हृदय रोग और कैंसर समेत कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते जोखिम से जोड़ा जाता है। ऐसे में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर निगरानी सिर्फ उपभोक्ता अधिकार का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।

जांच और कार्रवाई की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत

खाद्य पदार्थों में मिलावट और घटिया गुणवत्ता पर रोक लगाने के लिए खाद्य सुरक्षा विभागों को नियमित और प्रभावी नमूना जांच पर जोर देना होगा। खासकर दूध, पनीर, मावा और मिठाइयों जैसे अधिक खपत वाले उत्पादों की जांच को प्राथमिकता देने की जरूरत है।

साथ ही, नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में सुधार तभी संभव है, जब उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला की लगातार निगरानी हो।

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