"उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में एनटीपीसी रिहंद परियोजना से पर्यावरण और जनजीवन प्रभावित। खेती-किसानी में प्रदूषण, जंगलों की कटाई और स्वास्थ्य संकट पर उठे गंभीर सवाल।"
बीजपुर (सोनभद्र)। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच NTPC Limited की रिहंद परियोजना अब स्थानीय लोगों के लिए संकट का कारण बनती जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिस विकास की उम्मीद में उन्होंने अपनी जमीन और जंगल सौंपे थे, वही अब उनके जीवन और पर्यावरण के लिए विनाश साबित हो रहा है।
खैरी मिटीहनी टोला और सिरसोती ग्राम पंचायत के महुवाबारी जैसे गांवों में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। परियोजना से निकलने वाली राख (फ्लाई ऐश) ने न केवल पर्यावरण को प्रदूषित किया है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और पशु-पक्षियों के अस्तित्व पर भी खतरा पैदा कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि वे स्वच्छ हवा और पानी के लिए तरस रहे हैं।
जंगलों का सफाया, पहाड़ों का दोहन
स्थानीय लोगों के अनुसार, ऐश डैम के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की गई है। कई ऊंचे पहाड़ों को काटकर गहरे गड्ढों में बदल दिया गया है। इस प्रक्रिया में वर्षों पुराने पेड़ नष्ट हो गए, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है और जंगली जीवों का पलायन बढ़ गया है।
धूल और राख में घुटता जनजीवन
इलाके में उड़ती राख और धूल ने लोगों का जीवन दूभर कर दिया है। सांस संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। डर और दबाव के चलते लोग खुलकर विरोध भी नहीं कर पा रहे हैं।
भ्रष्टाचार और मिलीभगत के आरोप
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि इस पूरे मामले में कुछ अधिकारी, ठेकेदार और बिचौलिये मिलकर लाभ उठा रहे हैं, जबकि नुकसान आम जनता को झेलना पड़ रहा है। उनका कहना है कि उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है, जिससे क्षेत्र में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
उम्मीद से हकीकत तक
कभी विकास और रोजगार की उम्मीद लेकर आई यह परियोजना अब स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बन चुकी है। दशकों पहले दिखे सपने अब हकीकत के बोझ तले टूटते नजर आ रहे हैं।
ग्रामीणों की पीड़ा इन पंक्तियों में झलकती है—
“दगा किसी का सगा ना हुआ, नहीं किया तो करके देखो,
जिस किसी ने दगा किया है, जाकर उसके घर को देखो।”
बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वास्तव में विकास है, या विकास के नाम पर विनाश?
यदि समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
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