रुपये में बड़ी गिरावट: डॉलर हुआ महंगा, पेट्रोल-डीजल और इलेक्ट्रॉनिक्स के दाम बढ़ने के संकेत

कच्चे तेल की कीमतों और मिडिल ईस्ट तनाव का असर, विशेषज्ञ बोले- जल्द 100 के पार जा सकता है डॉलर

Indian Rupee All Time Low News: डॉलर के मुकाबले रुपया 95.94 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, मिडिल ईस्ट तनाव और विदेशी निवेश निकासी से रुपए पर दबाव बढ़ा। जानिए महंगाई, पेट्रोल-डीजल और आम जनता पर इसका क्या असर पड़ेगा।

नई दिल्ली। भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 30 पैसे टूटकर 95.94 के ऑलटाइम लो स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले गुरुवार को भी रुपया 95.64 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था। लगातार गिरते रुपए ने देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।

साल 2026 की शुरुआत से ही रुपए में लगातार कमजोरी देखने को मिल रही है। पिछले वर्ष दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 प्रति डॉलर के स्तर के पार गया था और अब यह तेजी से 96 के करीब पहुंच चुका है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात नहीं सुधरे और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो डॉलर जल्द 100 रुपए के स्तर तक पहुंच सकता है।

मिडिल ईस्ट संकट से बढ़ा दबाव

रुपए में गिरावट की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका से निवेशकों में डर का माहौल है।

वैश्विक संकट के समय निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि डॉलर की मांग बढ़ रही है और भारतीय रुपया कमजोर होता जा रहा है।

कच्चा तेल महंगा होने से बढ़ी मुश्किल

भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है। तेल महंगा होने से भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिसका सीधा असर रुपए की कीमत पर पड़ रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा और इससे चालू खाते का घाटा भी बढ़ सकता है।

मजबूत डॉलर और विदेशी निवेशकों की बिकवाली

दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 99.05 तक पहुंच गया है। डॉलर मजबूत होने का असर एशियाई मुद्राओं पर भी दिख रहा है और रुपया लगातार कमजोर हो रहा है।

इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। बुधवार को ही विदेशी निवेशकों ने 4,700 करोड़ रुपए से ज्यादा के शेयर बेचे। इससे बाजार से डॉलर बाहर गया और रुपए पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया।

महंगाई बढ़ने का खतरा

रुपए में गिरावट का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ सकता है। डॉलर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और आयातित सामानों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे खुदरा महंगाई में इजाफा होने की आशंका है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इसे ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ कहा जाता है, यानी विदेशों से आने वाली महंगाई। भारत में थोक महंगाई दर पहले ही साढ़े तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। ऐसे में रुपए की कमजोरी से महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।

विदेश में पढ़ाई और यात्रा होगी महंगी

डॉलर मजबूत होने का असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों पर भी पड़ेगा। अब डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। इसके अलावा मोबाइल, लैपटॉप और आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो सकते हैं क्योंकि इनका भुगतान डॉलर में किया जाता है।

सरकार सतर्क, प्रधानमंत्री ने की अपील

रुपए में लगातार गिरावट को देखते हुए प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में देशवासियों से विदेशी मुद्रा भंडार बचाने और फिजूलखर्ची कम करने की अपील की थी। सरकार ने कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए हैं ताकि डॉलर की मांग को नियंत्रित किया जा सके।

2027 तक रह सकता है संकट

रॉयटर्स के सर्वे के मुताबिक OPEC देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। वहीं सऊदी अरामको के CEO अमीन नासिर ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लौटने में 2027 तक का समय लग सकता है।

जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के अनुसार, अगर होर्मुज जलडमरूमध्य जल्द खुल भी जाता है, तब भी तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं।

कैसे तय होती है करेंसी की कीमत?

किसी देश की मुद्रा की कीमत मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है। जब किसी देश को आयात के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है, तो उसकी मुद्रा कमजोर होती है। वहीं विदेशी निवेश बढ़ने और डॉलर की आवक होने पर मुद्रा मजबूत होती है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी या बढ़ोतरी का असर सीधे रुपए की कीमत पर पड़ता है। यदि रिजर्व मजबूत रहेगा तो रुपया स्थिर रह सकता है, लेकिन डॉलर की कमी होने पर रुपया कमजोर होता जाएगा।

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