“लखनऊ की ऐतिहासिक शीश महल क्रिकेट ट्रॉफी को दोबारा शुरू करने की तैयारी तेज हो गई है। पूर्व रणजी क्रिकेटर मोहसिन रजा इस क्रिकेट धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और यूपीसीए से सहयोग मांगेंगे।“
लखनऊ। एक समय देश के घरेलू क्रिकेट में जिसकी पहचान आज के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) जैसी मानी जाती थी, लखनऊ की ऐतिहासिक शीश महल क्रिकेट ट्रॉफी एक बार फिर मैदान पर लौट सकती है। पूर्व मंत्री और पूर्व रणजी क्रिकेटर मोहसिन रजा ने इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए वे जल्द ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर सरकारी और संस्थागत सहयोग मांगेंगे।
करीब छह दशक तक भारतीय घरेलू क्रिकेट की पहचान रही शीश महल ट्रॉफी वर्ष 2010 में बंद हो गई थी। अब इसे फिर से शुरू करने की कवायद तेज हो गई है, जिससे लखनऊ की एक ऐतिहासिक खेल विरासत के पुनर्जीवित होने की उम्मीद जगी है।

शीश महल ट्रॉफी का गौरवशाली इतिहास
1951 में हुई थी शुरुआत
शीश महल क्रिकेट प्रतियोगिता की शुरुआत वर्ष 1951 में क्रिकेट प्रशासक और खेल प्रेमी एम. अस्करी हसन ने की थी। शुरुआती वर्षों में यह दो और तीन दिवसीय प्रारूप में खेली जाती थी, लेकिन बाद में इसे एकदिवसीय प्रारूप में बदल दिया गया।
समय के साथ यह प्रतियोगिता देश के सबसे प्रतिष्ठित घरेलू क्रिकेट आयोजनों में शामिल हो गई। अप्रैल और गर्मियों के मौसम में आयोजित होने वाले इस टूर्नामेंट में देशभर की शीर्ष टीमें और नामी खिलाड़ी हिस्सा लेते थे।
भारतीय क्रिकेट के दिग्गजों की रही मौजूदगी
क्रिकेट जगत के कई बड़े नाम इस टूर्नामेंट का हिस्सा रहे। पूर्व भारतीय कप्तान मंसूर अली खान पटौदी, कपिल देव, बिशन सिंह बेदी, नवजोत सिंह सिद्धू, वीरेंद्र सहवाग सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय खिलाड़ी शीश महल ट्रॉफी में खेल चुके हैं।
मोहसिन रजा के अनुसार, अपने स्वर्णिम दौर में केवल सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर को छोड़कर लगभग सभी बड़े भारतीय क्रिकेटरों ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था।
सुबह 6:30 बजे शुरू होते थे मुकाबले
उत्तर प्रदेश की भीषण गर्मी को देखते हुए मैच सुबह 6:30 बजे शुरू कर दिए जाते थे। इसके बावजूद दर्शकों का उत्साह इतना अधिक होता था कि स्टेडियम खचाखच भर जाते थे।
उस दौर में क्रिकेट प्रेमी अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को करीब से देखने के लिए बड़ी संख्या में मैदान पहुंचते थे। यही कारण था कि शीश महल ट्रॉफी केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि क्रिकेट प्रेमियों का उत्सव बन चुकी थी।
धोनी को मिली थी राष्ट्रीय पहचान
इस प्रतियोगिता की सबसे बड़ी पहचान यह रही कि यहां शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों पर राष्ट्रीय चयनकर्ताओं की विशेष नजर रहती थी।
पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का नाम भी इसी सूची में शामिल है। बताया जाता है कि 18 वर्ष की उम्र में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड की ओर से खेलते हुए धोनी ने शीश महल ट्रॉफी में शानदार अर्धशतक लगाया था। इसके बाद उनका नाम राष्ट्रीय क्रिकेट हलकों में तेजी से चर्चा में आया और आगे चलकर वे भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में शामिल हुए।
विदेशी टीमें भी लेती थीं हिस्सा
शीश महल ट्रॉफी की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं थी। 1970 और 1980 के दशक में संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों की टीमें भी इसमें भाग लेने के लिए लखनऊ पहुंचती थीं।
हालांकि टूर्नामेंट में इनामी राशि बहुत अधिक नहीं होती थी, लेकिन इसकी प्रतिष्ठा इतनी बड़ी थी कि खिलाड़ी और क्लब अपने खर्च पर यहां खेलने आते थे।
आईपीएल के बाद बंद हो गई थी प्रतियोगिता
वर्ष 2008 में आईपीएल की शुरुआत और बाद के वर्षों में उसके बढ़ते व्यावसायिक प्रभाव के कारण घरेलू क्रिकेट कैलेंडर में बड़े बदलाव हुए। अधिकांश स्टार खिलाड़ी आईपीएल और अन्य व्यस्त कार्यक्रमों में शामिल होने लगे।
इसी के चलते वर्ष 2010 के आसपास शीश महल ट्रॉफी का आयोजन बंद हो गया और लखनऊ की यह ऐतिहासिक खेल विरासत धीरे-धीरे स्मृतियों तक सिमट गई।
सीएम योगी से सहयोग मांगेंगे मोहसिन रजा
पूर्व मंत्री और रणजी क्रिकेटर मोहसिन रजा का कहना है कि इस टूर्नामेंट को दोबारा शुरू करने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर खेल विभाग और अन्य संस्थाओं का सहयोग मांगेंगे।
साथ ही उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) की मदद लेकर प्रतियोगिता को फिर से राष्ट्रीय स्तर का आयोजन बनाने की योजना है। उनका लक्ष्य आगामी क्रिकेट विंडो में टूर्नामेंट का आयोजन कराना है।
क्रिकेट जगत में उत्साह
लखनऊ के वरिष्ठ क्रिकेटरों और प्रशिक्षकों ने भी इस पहल का स्वागत किया है। वरिष्ठ क्रिकेटर अशोक बॉम्बी, प्रशिक्षक गोपाल सिंह और क्रिकेटर समीर मिश्रा सहित कई खेल हस्तियों का मानना है कि शीश महल ट्रॉफी की वापसी से प्रदेश के युवा खिलाड़ियों को बड़ा मंच मिलेगा।
उनका कहना है कि इस प्रतियोगिता ने अतीत में कई प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का काम किया था। यदि इसे आधुनिक स्वरूप के साथ फिर शुरू किया जाता है तो यह उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के घरेलू क्रिकेट को भी नई दिशा दे सकती है।
खेल धरोहर को बचाने की पहल
क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि आईपीएल के युग में भी पारंपरिक और ऐतिहासिक टूर्नामेंटों का अपना अलग महत्व है। शीश महल ट्रॉफी केवल एक क्रिकेट प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भारतीय घरेलू क्रिकेट के गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
ऐसे में यदि यह प्रतियोगिता दोबारा शुरू होती है तो लखनऊ की खेल विरासत को नई पहचान मिलने के साथ-साथ युवा क्रिकेटरों को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक और बड़ा मंच उपलब्ध हो सकेगा।
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