“महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल, बगावत और सत्ता परिवर्तन का लंबा इतिहास रहा है। कांग्रेस विभाजन, शरद पवार की बगावत, शिवसेना का उदय, एकनाथ शिंदे और अजित पवार की बगावत से लेकर 2026 के नए राजनीतिक संकट तक की पूरी कहानी जानिए।“
मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल, बगावत और सत्ता समीकरणों का बदलना कोई नई बात नहीं है। राज्य के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पिछले पांच दशकों में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं जिन्होंने न केवल महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया। कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन से लेकर शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुई टूट तक, महाराष्ट्र लगातार राजनीतिक प्रयोगों और सत्ता संघर्षों का केंद्र रहा है।
1969 में कांग्रेस विभाजन ने रखी नई राजनीति की नींव

महाराष्ट्र में राजनीतिक बगावत की कहानी 1969 में कांग्रेस के विभाजन से शुरू होती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट और संगठन के पुराने नेताओं के बीच चली इस लड़ाई ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। महाराष्ट्र के कई बड़े नेताओं ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया, जिनमें यशवंतराव चव्हाण और उनके राजनीतिक शिष्य शरद पवार प्रमुख थे।
38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनकर उभरे शरद पवार
आपातकाल के बाद 1977 के राजनीतिक बदलावों के बीच कांग्रेस फिर विभाजित हुई। उस समय शरद पवार ने कांग्रेस (यू) का साथ दिया। लेकिन 1978 में उन्होंने अपनी ही पार्टी से बगावत कर जनता पार्टी के समर्थन से प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) गठबंधन बनाया और मात्र 38 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए।

यह महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी बगावतों में से एक मानी जाती है। हालांकि 1980 में केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई, लेकिन शरद पवार ने खुद को राज्य की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी साबित कर दिया।
शिवसेना का उदय और बाल ठाकरे का प्रभाव
इसी दौरान 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की। मराठी अस्मिता और स्थानीय लोगों के अधिकारों को मुद्दा बनाकर खड़ी की गई शिवसेना ने जल्द ही मुंबई और महाराष्ट्र में मजबूत जनाधार तैयार कर लिया। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और सड़क स्तर पर उसकी सक्रियता उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई।

बाद में शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया और दोनों दल करीब ढाई दशक तक महाराष्ट्र की राजनीति में साथ रहे। लंबे समय तक शिवसेना को गठबंधन में बड़ी पार्टी माना जाता रहा।
1995 में बनी पहली शिवसेना-भाजपा सरकार
वर्ष 1995 महाराष्ट्र की राजनीति में ऐतिहासिक साबित हुआ, जब पहली बार शिवसेना-भाजपा गठबंधन सत्ता में आया। मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने और गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री। यह कांग्रेस के लंबे शासन का अंत था।
इस दौर में शिवसेना ने राज्य को तीन मुख्यमंत्री दिए—मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे। हालांकि कोई भी मुख्यमंत्री अपना पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सका।

1999 में शरद पवार ने फिर छोड़ी कांग्रेस
साल 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए पार्टी से अलग होने का फैसला किया और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठन किया।
हालांकि चुनाव के बाद भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस और एनसीपी ने हाथ मिला लिया। इसके बाद दोनों दलों ने लगभग डेढ़ दशक तक महाराष्ट्र की सत्ता साझा की।
2014 के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा की ताकत तेजी से बढ़ी। महाराष्ट्र में भी भाजपा और शिवसेना के रिश्तों में खटास आने लगी। विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा, हालांकि बाद में फिर साथ आ गए। लेकिन दोनों के बीच अविश्वास लगातार बढ़ता गया।
2019 की पांच दिन वाली सरकार ने चौंकाया देश
2019 विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा और शिवसेना में विवाद हो गया। शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद पर दावा किया, जबकि भाजपा इसके लिए तैयार नहीं हुई।
राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच अचानक सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। यह सरकार महज पांच दिन ही चल सकी।
इसके बाद शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर महाविकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन बनाया और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। यह महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे अप्रत्याशित गठबंधन माना गया।
2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में कर दी सबसे बड़ी बगावत
जून 2022 में शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायकों के साथ बगावत कर दी। इस घटनाक्रम ने उद्धव ठाकरे सरकार को गिरा दिया।
एकनाथ शिंदे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने और बाद में चुनाव आयोग ने उनके गुट को असली शिवसेना और पार्टी का ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न सौंप दिया। इससे उद्धव ठाकरे को बड़ा राजनीतिक झटका लगा।
2023 में एनसीपी में भी हुई बड़ी टूट
शिवसेना की टूट के एक वर्ष बाद जुलाई 2023 में अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार को चुनौती देते हुए एनसीपी में बगावत कर दी। पार्टी के अधिकांश विधायक उनके साथ चले गए और वे शिंदे सरकार में शामिल हो गए।

बाद में चुनाव आयोग ने अजित पवार गुट को ही असली एनसीपी के रूप में मान्यता दी। इस फैसले से शरद पवार को अपनी ही पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से हाथ धोना पड़ा।
2026 में फिर संकट में उद्धव ठाकरे की शिवसेना
लोकसभा चुनाव 2024 में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद 2026 में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) एक बार फिर संकट का सामना कर रही है। पार्टी के कुछ सांसदों के अलग रुख अपनाने की खबरों ने नए राजनीतिक संकट की अटकलों को जन्म दिया है।

उधर, स्थानीय निकाय चुनावों में भी पार्टी का प्रभाव कमजोर हुआ है। कभी मुंबई महानगरपालिका पर 25 वर्षों तक राज करने वाली शिवसेना (यूबीटी) अब सीमित स्थानीय प्रभाव तक सिमटती नजर आ रही है।
महाराष्ट्र की राजनीति में बगावत बनी परंपरा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में बगावत अब अपवाद नहीं बल्कि परंपरा बन चुकी है। शरद पवार की पहली राजनीतिक बगावत से लेकर एकनाथ शिंदे और अजित पवार के विद्रोह तक, हर दौर में सत्ता समीकरण बदलते रहे हैं। यही कारण है कि महाराष्ट्र को देश की सबसे गतिशील और अप्रत्याशित राजनीतिक प्रयोगशाला माना जाता है, जहां सत्ता की कहानी कभी स्थिर नहीं रहती।
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