नेपियर घास अभियान: डॉ. दिनेश चंद्र सिंह की पहल से सेना और गोशालाओं को मिला स्थायी समाधान

“नेपियर घास अभियान से सहारनपुर में भारतीय सेना के अश्वों और उत्तर प्रदेश की गोशालाओं को वर्षभर हरा चारा मिल रहा है। जानिए डॉ. दिनेश चंद्र सिंह की सफल पहल की पूरी कहानी।”

सहारनपुर। नेपियर घास अभियान उत्तर प्रदेश में पशुपालन, गोसंरक्षण और भारतीय सेना के लिए एक सफल मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है। सहारनपुर स्थित रिमाउंट ट्रेनिंग स्कूल एवं डिपो में लगभग 90 एकड़ क्षेत्रफल में नेपियर घास की खेती की जा रही है। इस पहल से सेना के अश्वों के लिए पूरे वर्ष पौष्टिक एवं हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है।

करीब दो वर्ष पहले डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने स्थानीय अधिकारियों के सहयोग से संस्थान में नेपियर घास रोपण अभियान शुरू कराया था। आज यह अभियान पूरी तरह सफल साबित हो चुका है और भारतीय सेना के अश्व प्रबंधन के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।

इस अभियान की नींव उस समय पड़ी थी जब उत्तर प्रदेश में निराश्रित गोवंश संरक्षण अभियान के दौरान गोशालाओं में हरे चारे की भारी कमी सामने आई थी। उस समय बहराइच के जिलाधिकारी के रूप में कार्यरत डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने सभी विकास खंडों की गोशालाओं में बड़े पैमाने पर नेपियर घास लगाने का निर्णय लिया।

उनके निर्देशन में सभी खंड विकास अधिकारियों ने अपनी-अपनी गोशालाओं में नेपियर घास का उत्पादन शुरू कराया। परिणामस्वरूप गोवंश को नियमित पौष्टिक हरा चारा मिलने लगा और गोशालाओं में चारे की समस्या काफी हद तक समाप्त हो गई।

बहराइच मॉडल की सफलता के बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों ने भी इस व्यवस्था को अपनाया। वर्तमान समय में प्रदेश के अधिकांश गो-आश्रय स्थलों में नेपियर घास का बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा रहा है।

सहारनपुर स्थित रिमाउंट ट्रेनिंग स्कूल एवं डिपो में मिली सफलता ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि नेपियर घास केवल गोवंश ही नहीं बल्कि सेना के अश्वों के लिए भी अत्यंत पौष्टिक, टिकाऊ और कम लागत वाला हरा चारा है।

नेपियर घास क्यों है खास?

नेपियर घास विश्व की सर्वाधिक उत्पादक चारा फसलों में गिनी जाती है। इसकी विशेषता है कि यह तेजी से बढ़ती है, बार-बार कटाई के बाद भी दोबारा उग आती है तथा इसमें प्रोटीन एवं पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। कम लागत में अधिक उत्पादन मिलने के कारण यह किसानों, पशुपालकों, डेयरी सेक्टर, गोशालाओं और सैन्य संस्थानों के लिए लाभदायक विकल्प मानी जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को अन्य राज्यों में भी व्यापक स्तर पर लागू किया जाए तो पशुपालन और गोसंरक्षण के क्षेत्र में दीर्घकालिक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

देश-दुनिया से जुड़े राजनीतिक और सामयिक घटनाक्रम की विस्तृत और सटीक जानकारी के लिए ‘आज का सफर’ के साथ जुड़े रहें। ताज़ा खबरों, चुनावी बयानबाज़ी और विशेष रिपोर्ट्स के लिए हमारे साथ बने रहें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button