22 साल जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी, कहा- देरी और लापरवाही ने छीन ली इंसान की आजादी

Supreme Court ने हत्या मामले में 22 साल जेल काट चुके अर्जुन जानी को बरी कर दिया। SC ने न्याय व्यवस्था की देरी और कमजोर जांच पर चिंता जताते हुए कहा कि न्याय में देरी से किसी की आजादी खत्म नहीं होनी चाहिए।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में हत्या के मामले में 22 साल से जेल में बंद व्यक्ति को बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान न्याय व्यवस्था की खामियों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय मिलने में होने वाली देरी और संवेदनहीनता किसी व्यक्ति की जिंदगी के कई साल छीन सकती है।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने 4 अगस्त को यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि यह मामला इस बात का उदाहरण है कि किस तरह न्याय में देरी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकती है।

3157 दिन की देरी के कारण खारिज हुई थी अपील

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करने में हुई 3157 दिनों की देरी को आधार बनाकर जेल अपील खारिज कर दी गई थी। उस समय आरोपी 12 साल जेल में बिता चुका था, जबकि अब उसकी कुल कैद की अवधि 22 साल हो चुकी थी।

पीठ ने कहा कि अपील में देरी के कारण किसी व्यक्ति को उसके सबसे महत्वपूर्ण अधिकार यानी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल उदार दृष्टिकोण नहीं, बल्कि सक्रिय और संवेदनशील रुख अपनाने की जरूरत है।

न्याय व्यवस्था को आत्ममंथन की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट

पीठ ने कहा कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों तक न्याय की पहुंच अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। अदालत ने कहा कि जब लोकतंत्र के तीनों स्तंभ हर नागरिक को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं, तब संवैधानिक अदालतों को भी अपनी कार्यप्रणाली पर विचार करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस मामले में निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और हाई कोर्ट भी प्रभावी समीक्षा करने में विफल रहा। इसके परिणामस्वरूप एक व्यक्ति के जीवन के 22 साल बिना विश्वसनीय साक्ष्य के समाप्त हो गए।

कमजोर गवाही के आधार पर हुई थी सजा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी और मुख्य गवाह की गवाही में कई गंभीर खामियां थीं। अदालत ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शी की गवाही कमजोर और बेहद अविश्वसनीय थी, जिसके आधार पर दोष सिद्ध करना उचित नहीं था।

पीठ ने कहा कि केवल किसी एक प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन इसके लिए गवाही विश्वसनीय, स्पष्ट और परिस्थितियों से मेल खाने वाली होनी चाहिए। इस मामले में ऐसा नहीं था।

तीन महिलाओं की हत्या का था आरोप

मामले में ओडिशा के कोरापुट जिले की तीन महिलाओं- कमला, सोनबारी और रतनाई की हत्या का आरोप लगाया गया था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी अर्जुन जानी पर हत्या का आरोप था और एक प्रत्यक्षदर्शी ने उसके खिलाफ बयान दिया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी की बातों में कई विरोधाभास थे और यह स्पष्ट नहीं था कि उसने घटना के तुरंत बाद किसी को इसकी जानकारी दी थी या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास के निर्देश दिए

अर्जुन जानी की अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। साथ ही अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कोरापुट को उसके पुनर्वास और दोबारा जीवन शुरू करने में मदद करने का निर्देश दिया।

पीठ ने कहा कि जिला प्रशासन और जिला कलेक्टर को इस प्रक्रिया में सहयोग करना चाहिए ताकि लंबे समय तक जेल में रहने के बाद उसे समाज में फिर से स्थापित किया जा सके।

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