यमुना फ्लडप्लेन मामले में आर्ट ऑफ लिविंग को बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी का आदेश किया रद्द

यमुना फ्लडप्लेन नुकसान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आर्ट ऑफ लिविंग को बड़ी राहत दी है। अदालत ने एनजीटी का 2017 का आदेश रद्द करते हुए डी़डीए को 5 करोड़ रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि चार सप्ताह में लौटाने का निर्देश दिया।

नई दिल्ली। यमुना फ्लडप्लेन को नुकसान पहुंचाने के मामले में श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के वर्ष 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 2016 में आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के कारण यमुना के बाढ़ क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने के लिए संस्था को जिम्मेदार ठहराया गया था।

न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने यह फैसला आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़ी संस्था व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया की अपील पर सुनाया। कोर्ट ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को निर्देश दिया कि संस्था की ओर से जमा कराई गई ₹5 करोड़ की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि वापस की जाए।

चार सप्ताह के भीतर लौटानी होगी ₹5 करोड़ की राशि

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि DDA को यह राशि आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर वापस करनी होगी। यह रकम मार्च 2016 में NGT के अंतरिम आदेश के अनुपालन में जमा कराई गई थी।

NGT ने वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल को आयोजित करने की अनुमति देते हुए आर्ट ऑफ लिविंग को ₹5 करोड़ पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के रूप में जमा कराने का निर्देश दिया था। बाद में पर्यावरणीय नुकसान के आकलन के आधार पर अंतिम क्षतिपूर्ति में इस राशि को समायोजित किए जाने की बात कही गई थी।

‘पोल्यूटर पे’ सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति या संस्था से क्षतिपूर्ति वसूलने के लिए ‘पोल्यूटर पे’ सिद्धांत लागू होता है। लेकिन इसके लिए पहले यह साबित होना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में प्रदूषण या पर्यावरणीय नुकसान के लिए जिम्मेदार है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को कानून के तहत पूर्ण रूप से जिम्मेदार ठहराने से पहले यह स्थापित करना जरूरी है कि पर्यावरणीय क्षति उसी के कारण हुई है। मौजूदा मामले में इस तरह का कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ।

नुकसान और आयोजन के बीच संबंध साबित नहीं हुआ

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता कि आयोजन के कारण यमुना फ्लडप्लेन को नुकसान पहुंचा। अदालत के अनुसार, आयोजन स्थल संस्था को सौंपे जाने से पहले ही जर्जर स्थिति में था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिससे संकेत मिलता है कि कथित नुकसान के लिए संस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि NGT ने मामले में मौजूद उन तथ्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया, जो संस्था को आरोपों से मुक्त करते थे।

NGT ने विवाद की प्रकृति ही बदल दी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने NGT के दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि अधिकरण ने मूल विवाद के स्वरूप को बदल दिया और मामले को यमुना फ्लडप्लेन के नए विकास की कार्यवाही में बदल दिया।

अदालत ने कहा कि इस प्रक्रिया में संस्था पर उस क्षेत्र के विकास का खर्च भी डाल दिया गया, जिसे उसने नष्ट नहीं किया था। यानी जिस चीज को संस्था ने नुकसान नहीं पहुंचाया, उसके विकास की जिम्मेदारी भी उसी पर डाल दी गई।

समिति की रिपोर्ट में नहीं मिला था महत्वपूर्ण नुकसान

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की समिति की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। समिति ने आयोजन स्थल का निरीक्षण कर बताया था कि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा घास से ढका हुआ था और कुछ हिस्से पानी में थे। समिति को आयोजन स्थल पर मलबा नहीं मिला था और आवंटित क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण वेटलैंड या जल निकाय भी नहीं पाया गया था।

समिति ने आयोजन से पहले और बाद की गूगल अर्थ तस्वीरों का भी अध्ययन किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि आयोजन से पहले और बाद में क्षेत्र की स्थिति में बहुत अधिक अंतर नहीं था।

पीठ ने कहा कि समिति की तीसरी रिपोर्ट ने आयोजन के कारण पर्यावरणीय क्षति के आरोपों को प्रभावी रूप से कमजोर कर दिया था। इसके बावजूद NGT ने इस रिपोर्ट को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि समिति को नुकसान का आकलन करने का अधिकार नहीं दिया गया था।

‘सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना चाहिए था’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तटस्थ तथ्य-जांच समिति के रूप में NGT को मामले में उपलब्ध सभी प्रासंगिक सामग्री पर विचार करना चाहिए था। अदालत ने अधिकरण के उस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया, जिसमें समिति की रिपोर्ट को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए उसमें दर्ज तथ्यों की अनदेखी की गई।

पीठ ने कहा कि समिति की रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों को चुनौती नहीं दी गई थी और न ही उन्हें गलत साबित किया गया था। ऐसे में उन्हें मामले में संस्था की जिम्मेदारी तय करते समय नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए था।

सैटेलाइट तस्वीर पर भी उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने उस सैटेलाइट तस्वीर पर भी सवाल उठाए, जिसमें आयोजन स्थल को हराभरा दिखाया गया था। पीठ ने कहा कि NGT को यह जांचना चाहिए था कि सैटेलाइट तस्वीर में फ्लडप्लेन की स्थिति इतनी बेहतर कैसे दिखाई दे रही थी।

अदालत ने कहा कि आयोजन से पहले स्थल पर मौजूद बड़ी मात्रा में मलबा और निर्माण सामग्री संस्था ने ही हटाई थी, ताकि आयोजन के लिए जगह तैयार की जा सके। इसलिए 2015 की सैटेलाइट तस्वीर को क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का विश्वसनीय प्रमाण नहीं माना जा सकता।

आर्ट ऑफ लिविंग ने फैसले का किया स्वागत

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आर्ट ऑफ लिविंग के प्रवक्ता ने फैसले का स्वागत किया। संस्था की ओर से कहा गया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठन पर गलत आरोप लगाए जाने का मामला अब सामने आ गया है।

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