सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राजस्व रिकॉर्ड में नाम चढ़ने से नहीं मिलता संपत्ति का मालिकाना हक

Supreme Court Property Rights: सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन या नामांतरण से संपत्ति का मालिकाना हक न तो बनता है और न खत्म होता है। टाइटल का फैसला केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर नहीं किया जा सकता।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि राजस्व रिकॉर्ड में दाखिल-खारिज (Mutation), नामांतरण या किसी व्यक्ति के नाम की प्रविष्टि होने मात्र से संपत्ति का मालिकाना हक न तो पैदा होता है और न ही समाप्त होता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियों के आधार पर संपत्ति विवाद का निर्णय किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति का टाइटल केवल राजस्व रिकॉर्ड देखकर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित दस्तावेजों और अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों का भी मूल्यांकन जरूरी है।

दाखिल-खारिज से मालिकाना हक क्यों नहीं बदलता?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन या नामांतरण का मुख्य उद्देश्य राजस्व यानी टैक्स या लगान की वसूली को व्यवस्थित करना है। किसी व्यक्ति का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो जाने से वह अपने आप संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता।

इसी तरह यदि किसी व्यक्ति का नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाकर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया जाता है, तो केवल इस आधार पर पहले व्यक्ति का संपत्ति पर मालिकाना हक खत्म नहीं माना जा सकता।

अदालत ने साफ किया कि राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि संपत्ति के टाइटल का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

दूसरे व्यक्ति के नाम एंट्री होने से अधिकार का त्याग नहीं माना जाएगा

पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी संपत्ति के राजस्व रिकॉर्ड में किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाता है, तो मात्र इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि संपत्ति पर अधिकार रखने वाले व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपना अधिकार छोड़ दिया है।

यदि कोई पक्ष यह दावा करता है कि संपत्ति पर अधिकार स्वेच्छा से छोड़ दिया गया था, तो उस दावे को स्वतंत्र और ठोस साक्ष्यों से साबित करना होगा।

यानी केवल दाखिल-खारिज की प्रविष्टि को संपत्ति के अधिकार के हस्तांतरण या त्याग का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

राजस्व रिकॉर्ड का इस्तेमाल किसलिए होता है?

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियां मुख्य रूप से राजस्व वसूली के प्रशासनिक उद्देश्य से संबंधित होती हैं।

नायब तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारी रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव कर सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति का नाम हटाकर दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज कर देना अपने आप में संपत्ति के कानूनी अधिकार का हस्तांतरण नहीं है।

संपत्ति का वास्तविक मालिक कौन है, यह सवाल अलग है और इसका अंतिम निर्धारण संबंधित सिविल न्यायालय में उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है।

राजस्व रिकॉर्ड की एंट्री ‘खंडन योग्य साक्ष्य’

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 के संदर्भ में कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि को वैधानिक मान्यता प्राप्त हो सकती है, लेकिन यह खंडन योग्य साक्ष्य है।

इसका मतलब यह है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी को अंतिम और अटल मालिकाना प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि इसके विपरीत अन्य विश्वसनीय दस्तावेज या साक्ष्य उपलब्ध हैं तो राजस्व प्रविष्टि को चुनौती दी जा सकती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि म्यूटेशन एंट्री का अपना कोई ऐसा अनुमानात्मक मूल्य नहीं है, जिसके आधार पर किसी व्यक्ति के मालिकाना हक को अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया जाए।

सिविल कोर्ट तय करेगी संपत्ति का असली टाइटल

शीर्ष अदालत के अनुसार, राजस्व अधिकारी रिकॉर्ड में बदलाव कर सकते हैं, लेकिन संपत्ति के वास्तविक टाइटल का अंतिम फैसला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।

इसलिए यदि दो पक्षों के बीच किसी जमीन या मकान के मालिकाना हक को लेकर विवाद है, तो केवल खतौनी, खसरा, जमाबंदी या म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

संपत्ति से संबंधित बिक्री विलेख, वसीयत, उत्तराधिकार, कब्जे और अन्य प्रासंगिक दस्तावेजों तथा साक्ष्यों को भी देखा जाएगा।

राजस्व रिकॉर्ड में एंट्री की तारीख से सीमा अवधि तय नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने सीमा अवधि यानी Limitation Period से जुड़े पहलू पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी कानूनी दावे के लिए सीमा अवधि की शुरुआत केवल उस तारीख से तय नहीं की जा सकती, जिस दिन राजस्व रिकॉर्ड में कोई प्रविष्टि की गई थी।

यानी राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की तारीख अपने आप किसी संपत्ति विवाद में कानूनी दावे की समय-सीमा तय करने का एकमात्र आधार नहीं बन सकती।

संपत्ति विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर?

यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां संपत्ति का मालिकाना हक केवल दाखिल-खारिज, नामांतरण, खतौनी या अन्य राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर तय करने की कोशिश की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता के बाद यह बात फिर सामने आई है कि राजस्व रिकॉर्ड और टाइटल रिकॉर्ड एक ही चीज नहीं हैं। राजस्व रिकॉर्ड प्रशासनिक और राजस्व संबंधी उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन मालिकाना हक का अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनी साक्ष्यों के आधार पर होगा।

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