
“इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर ट्रिब्यूनल बेटे-बहू को मकान से बेदखल कर सकता है। कोर्ट ने इसे अंतिम उपाय बताया है।“
प्रयागराज। वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार और उनकी सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बुजुर्ग की जान-माल की सुरक्षा के लिए आवश्यक हो, तो माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल को बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने का अधिकार है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बेदखली की यह शक्ति असाधारण परिस्थितियों में अंतिम उपाय के रूप में ही इस्तेमाल की जानी चाहिए। ट्रिब्यूनल को मामले के तथ्यों और बुजुर्ग की सुरक्षा की वास्तविक आवश्यकता को देखते हुए निर्णय लेना होगा।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कानपुर निवासी श्यामजी शुक्ला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
स्व-अर्जित मकान में बेटे-बहू पर लगाए गंभीर आरोप
मामला कानपुर के यशोदा नगर स्थित एक मकान से जुड़ा है। याची श्यामजी शुक्ला इस मकान के मालिक हैं और उनके अनुसार यह उनकी स्व-अर्जित संपत्ति है।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे पीयूष शुक्ला और बहू प्रीति शुक्ला उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं। याची ने गाली-गलौज और मारपीट के साथ ही अपनी जान को खतरा होने की बात भी कही।
इन परिस्थितियों को देखते हुए श्यामजी शुक्ला ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 5 और धारा 22 के तहत एसडीएम सदर, कानपुर नगर की ट्रिब्यूनल में बेटे-बहू को मकान से बेदखल करने की मांग की थी।
ट्रिब्यूनल ने दी पुलिस सुरक्षा, लेकिन बेदखली से किया इनकार
मामले में ट्रिब्यूनल ने 13 जनवरी 2026 को आदेश जारी किया। ट्रिब्यूनल ने याची को आंशिक राहत देते हुए उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस को निर्देश दिए, लेकिन बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने की मांग स्वीकार नहीं की।
इसके बाद श्यामजी शुक्ला ने ट्रिब्यूनल के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अलग आरोप लगाए गए। कहा गया कि दहेज की मांग पूरी नहीं होने के कारण ससुर की ओर से यह कार्रवाई की गई है।
बहू की ओर से यह भी बताया गया कि उसने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत संरक्षण की मांग करते हुए एसीजेएम, कानपुर की अदालत में मुकदमा दायर किया है।
कानून में अधिकार है तो उसे लागू करने की शक्ति भी निहित: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी कानून के तहत किसी प्राधिकरण को कोई अधिकार दिया जाता है, तो उस अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक शक्तियां भी उसमें निहित मानी जाती हैं।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के तहत परिस्थितियों के अनुसार ट्रिब्यूनल के पास बेदखली की शक्ति हो सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने इस शक्ति की सीमा भी स्पष्ट कर दी।
सिविल कोर्ट जैसा पूर्ण अधिकार नहीं है ट्रिब्यूनल को
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल को बेटे-बहू को मकान से बेदखल करने का अधिकार सिविल कोर्ट के समान पूर्ण अधिकार नहीं माना जा सकता। इस शक्ति का इस्तेमाल हर पारिवारिक विवाद में नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के अनुसार, बेदखली का आदेश तभी उचित होगा, जब बुजुर्ग की जान और संपत्ति की सुरक्षा के लिए यह कदम वास्तव में जरूरी हो और परिस्थितियां असाधारण हों।
इसलिए ट्रिब्यूनल को केवल आरोपों के आधार पर फैसला नहीं करना होगा, बल्कि यह देखना होगा कि बुजुर्ग की सुरक्षा के लिए बेदखली वास्तव में आवश्यक है या नहीं।
बेटे के खिलाफ तीन महीने में फैसला लेने का निर्देश
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वह बेटे के खिलाफ बेदखली की मांग पर तीन महीने के भीतर फैसला करे। साथ ही बहू से संबंधित मामले में आने वाले निर्णय को भी ध्यान में रखने को कहा गया है।
खंडपीठ ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में दिए अपने आदेश में ट्रिब्यूनल के उस हिस्से को रद कर दिया था, जिसमें बेदखली की मांग पर विचार ही नहीं किया गया था।
बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है कल्याणकारी कानून
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण से जुड़ा कानून परिवारों में बढ़ते विवाद और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच बुजुर्गों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया है।
कोर्ट ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है। इसलिए यदि परिस्थितियां ऐसी हों कि उनके साथ रहने वाले परिजन ही उनकी जान-माल के लिए गंभीर खतरा बन जाएं, तो कानून के तहत उपलब्ध उपायों पर विचार किया जा सकता है।
बेटे-बहू और पिता के आरोपों पर कोर्ट ने नहीं दी कोई राय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने पिता और बेटे-बहू के बीच लगाए गए आरोप-प्रत्यारोप की सत्यता पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों की वास्तविकता और परिस्थितियों का मूल्यांकन करना ट्रिब्यूनल का काम है। ट्रिब्यूनल को यह तय करना होगा कि याची की सुरक्षा के लिए बेटे या बहू को मकान से बेदखल करना आवश्यक है या नहीं।
इस तरह हाईकोर्ट के फैसले ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के तहत ट्रिब्यूनल की शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। साथ ही यह भी साफ किया है कि बेदखली की शक्ति का इस्तेमाल केवल असाधारण परिस्थितियों में अंतिम उपाय के तौर पर किया जाना चाहिए।
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