
“BRICS Summit 2026 में रूस और ईरान ने अमेरिका-पश्चिमी प्रतिबंधों की आलोचना की। स्थानीय मुद्रा में व्यापार, NDB और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था के बीच भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन की बड़ी चुनौती है।“
नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में आयोजित BRICS Summit 2026 में अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों को लेकर रूस और ईरान के तेवर तीखे नजर आए। दोनों देशों ने पश्चिमी प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए ब्रिक्स देशों से ऐसी रणनीति तैयार करने का आग्रह किया, जिससे समूह बाहरी दबाव और आर्थिक चुनौतियों का मजबूती से सामना कर सके।
ब्रिक्स बिजनेस फोरम में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बयानों ने भारत के सामने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती भी खड़ी कर दी है। भारत जहां ब्रिक्स को आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय संवाद का मंच बनाए रखना चाहता है, वहीं रूस और ईरान के रुख से इस मंच पर अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों के खिलाफ आवाज और मुखर होती दिखाई दे रही है।
ईरान ने प्रतिबंधों और सैन्य दबाव पर उठाए सवाल
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं। उनके मुताबिक, हाल के महीनों में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के कारण ईरान पर दबाव और अधिक गंभीर हुआ है।
पेजेशकियन ने आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि किसी देश के व्यापार, ऊर्जा ढांचे या वित्तीय व्यवस्था पर राजनीतिक अथवा सैन्य दबाव का प्रभाव केवल उस देश तक सीमित नहीं रहता। इसका असर क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक सुरक्षा के दो महत्वपूर्ण आधार हैं। ईरान ने अपने ऊर्जा संसाधनों और भौगोलिक स्थिति का हवाला देते हुए खुद को ब्रिक्स की खाद्य, ऊर्जा और परिवहन आपूर्ति श्रृंखला में रणनीतिक साझेदार के तौर पर पेश किया।
पुतिन ने पश्चिमी दबाव की रणनीति पर साधा निशाना
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी पश्चिमी देशों की नीतियों पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ देश अपना पुराना वैश्विक दबदबा वापस हासिल करने के लिए हर संभव तरीका अपना रहे हैं और इसके लिए प्रत्यक्ष बल प्रयोग तक किया जा रहा है।
पुतिन ने औद्योगिक और लॉजिस्टिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने, अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारों में बाधा डालने और समुद्री जहाजों पर कब्जे की कोशिशों का उल्लेख किया। उन्होंने उन देशों पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों की भी आलोचना की जो अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना चाहते हैं।
रूसी राष्ट्रपति ने ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार, बुनियादी ढांचे और तकनीकी परियोजनाओं के लिए नए निवेश मंच की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने तथा भरोसेमंद वैश्विक परिवहन मार्ग विकसित करने की बात कही।
नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर और नए निवेश मंच पर जोर
पुतिन ने ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और नॉर्थ-साउथ इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे मार्गों को विकसित करने में सहयोग की पेशकश की। रूस का जोर ऐसे परिवहन नेटवर्क पर है जो मौजूदा वैश्विक व्यापार मार्गों के विकल्प उपलब्ध करा सकें और सदस्य देशों के बीच व्यापार को अधिक सुगम बनाया जा सके।
इसके साथ ही उन्होंने निवेश के लिए नए प्लेटफॉर्म के निर्माण और ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की भूमिका बढ़ाने की वकालत की। इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचा और अन्य रणनीतिक परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग को मजबूत करना है।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने की ईरान की मांग
ईरान ने ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने का मुद्दा भी उठाया। पेजेशकियन ने सीमा पार भुगतान और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
ईरान की ओर से करीब 10 अरब डॉलर की शुरुआती राशि वाले री-इंश्योरेंस पूल की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा गया। इसके अलावा न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने की पैरवी की गई।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स के कुछ सदस्य देश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की प्रमुख भूमिका को कम करने की दिशा में लगातार चर्चा कर रहे हैं।
चीन के डी-डॉलरीकरण रुख से बढ़ सकती है संवेदनशीलता
ब्रिक्स के भीतर आर्थिक सहयोग का यह एजेंडा भारत के लिए संवेदनशील है। चीन लंबे समय से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने की वकालत करता रहा है। वहीं रूस और ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों से प्रभावित होने के कारण वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था में विशेष रुचि रखते हैं।
ऐसे में ब्रिक्स के मंच पर यदि डी-डॉलरीकरण, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और पश्चिमी वित्तीय संस्थानों के समानांतर सिस्टम की चर्चा ज्यादा आगे बढ़ती है तो अमेरिका की प्रतिक्रिया पर भी नजर रहेगी।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती रणनीतिक संतुलन बनाए रखना है। भारत ब्रिक्स का महत्वपूर्ण सदस्य होने के साथ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी अपने रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है।
इसलिए नई दिल्ली नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स की बैठक केवल अमेरिका या पश्चिमी देशों के विरोध के मंच के रूप में दिखाई दे। भारत की पारंपरिक विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट यानी अलग-अलग शक्तियों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखने पर जोर रहा है।
रूस और ईरान के आक्रामक बयानों के बीच भारत के लिए जरूरी होगा कि ब्रिक्स का एजेंडा आर्थिक विकास, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक दक्षिण के हित और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे व्यापक मुद्दों पर केंद्रित रहे।
अमेरिका की नजर भी ब्रिक्स की गतिविधियों पर
ब्रिक्स में बढ़ती आर्थिक और वित्तीय सहयोग की चर्चा पर अमेरिका की नजर रहना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब रूस और ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ आवाज उठा रहे हों और चीन वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था तथा डी-डॉलरीकरण जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाने में रुचि रखता हो।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही ब्रिक्स को लेकर अपनी असहमति और चिंता सार्वजनिक रूप से जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में भारत की मेजबानी में हो रही इस बैठक में यदि अमेरिका विरोधी प्रस्ताव या बयान प्रमुखता से सामने आते हैं तो इससे नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना औ









