
“इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि SC/ST वर्ग से होने मात्र से एससी/एसटी एक्ट की धाराएं नहीं लग सकतीं। गाजियाबाद के जमीन विवाद में जातिसूचक टिप्पणी और सार्वजनिक अपमान का सबूत न मिलने पर कोर्ट ने एक्ट के तहत समन रद्द किया।“
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के इस्तेमाल को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के SC या ST वर्ग से होने मात्र से एससी/एसटी एक्ट की धाराएं लागू नहीं हो जातीं। इसके लिए यह सामने आना जरूरी है कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण जानबूझकर अपमानित किया हो और कानून में वर्णित परिस्थितियां पूरी होती हों।
हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र में जमीन के लेनदेन से जुड़े मामले में आरोपी राजू कुरैशी उर्फ उमरदराज के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत जारी समन आदेश और इस अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, धोखाधड़ी और अमानत में खयानत से जुड़े आरोपों की कार्यवाही जारी रहेगी।
जमीन के सौदे में 2.41 लाख रुपये एडवांस लेने का आरोप
मामला गाजियाबाद के लोनी थाना क्षेत्र के ग्राम बंथला का है। वर्ष 2025 में दर्ज एफआईआर में आरोपी पर जमीन के सौदे के दौरान 2.41 लाख रुपये एडवांस लेने के बाद बैनामा न करने का आरोप लगाया गया था।
एफआईआर में जालसाजी और धोखाधड़ी सहित अन्य आरोपों के साथ एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी लगाई गई थीं। मामले में गाजियाबाद की विशेष एससी/एसटी अदालत ने आरोपी के खिलाफ समन जारी किया था।
राजू कुरैशी ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने बताया जमीन का दीवानी विवाद
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि मूल विवाद जमीन के लेनदेन से जुड़ा है और इसे आपराधिक एवं जातिगत विवाद का रूप दिया गया है।
दलील में यह भी कहा गया कि कथित घटना के संबंध में सार्वजनिक रूप से जातिसूचक टिप्पणी किए जाने का कोई आरोप नहीं है। इसी आधार पर एससी/एसटी एक्ट की धाराओं को चुनौती दी गई।
रिकॉर्ड में जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का सबूत नहीं
जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड और केस डायरी का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध सामग्री में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह प्रदर्शित हो कि आरोपी ने पीड़ित के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया या उसे सार्वजनिक स्थान पर उसकी जाति के कारण अपमानित किया।
कोर्ट के अनुसार, एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध के लिए केवल पीड़ित का SC/ST समुदाय से होना पर्याप्त नहीं है। मामले के तथ्यों से यह भी सामने आना चाहिए कि कथित कृत्य कानून के तहत निर्धारित जातिगत अपमान या अत्याचार की श्रेणी में आता है।
जाति के कारण जानबूझकर अपमान का इरादा जरूरी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी विवाद में पीड़ित की जाति के कारण उसे जानबूझकर अपमानित करने का आरोप और उसके समर्थन में आवश्यक तथ्य मौजूद नहीं हैं, तो केवल संपत्ति या दूसरे दीवानी विवाद के आधार पर एससी/एसटी एक्ट की धाराओं को लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामले में सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने का पहलू भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध रिकॉर्ड में इस तरह की आवश्यक परिस्थितियों का प्रमाण नहीं मिला।
संपत्ति विवाद को जातिगत रंग देना कानून का दुरुपयोग
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि विशुद्ध रूप से दीवानी या संपत्ति संबंधी विवाद को आपराधिक अथवा जातिगत रंग देना कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग की स्थिति पैदा कर सकता है।
इसी आधार पर कोर्ट ने राजू कुरैशी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत जारी समन आदेश को रद्द कर दिया और इस अधिनियम के तहत उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही समाप्त कर दी।
धोखाधड़ी के आरोपों पर सुनवाई रहेगी जारी
हाईकोर्ट के आदेश का प्रभाव केवल एससी/एसटी एक्ट से जुड़े आरोपों तक सीमित है। जमीन के लेनदेन से संबंधित धोखाधड़ी और अमानत में खयानत के आरोपों पर कार्यवाही जारी रहेगी।
इस तरह हाईकोर्ट ने एक तरफ एससी/एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों को रिकॉर्ड में पर्याप्त आधार न मिलने पर रद्द किया, वहीं मूल संपत्ति लेनदेन से जुड़े आरोपों की न्यायिक प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी है।
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